टेस्ला के आने से भारतीय ईवी उद्योग पर असर नहीं

प्रो अश्विनी महाजन
लंबे समय से इलेक्ट्रिक वाहन बनाने वाली अमेरिकी कंपनी टेस्ला भारत में अपनी कारें बेचने का प्रयास करती रही है।  कंपनी का यह कहना रहा है कि पहले उसे अपनी कारें बेचने हेतु मार्ग प्रशस्त किया जाए, बाद में कंपनी भारत में उत्पादन केंद्र खोलकर यहीं पर विनिर्माण शुरू करने पर विचार करेगी।  गौरतलब है कि लंबे समय से ऑटोमोबाइल क्षेत्र के संरक्षण हेतु भारत सरकार विदेशों से आने वाले वाहनों पर भारी आयात शुल्क लगाती रही है।  अभी तक 40 हजार डॉलर की कीमत से ज्यादा की कारों पर 110 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया जाता है, जबकि उससे कम की कारों पर आयात शुल्क 60 फीसदी है।
टेस्ला के संस्थापक एलन मस्क का, जो ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिकी प्रशासन में अहम भूमिका रखते हैं, लगातार यह आग्रह रहा है कि टेस्ला कारों के भारत में आयात पर शुल्क घटाया जाए।  हाल ही में पेश बजट में 40 हजार डॉलर से अधिक कीमत वाली कारों पर आयात शुल्क 110 प्रतिशत से घटाकर 70 फीसदी कर दिया गया है।  माना जा रहा है कि इससे देश में टेस्ला कारों की बिक्री का मार्ग प्रशस्त हो गया है।  टेस्ला ने भारत में अपने शोरूम खोलने की कवायद भी शुरू कर दी है।
दूसरी तरफ यह भी सच है कि लंबे समय तक देश की ऑटोमोबाइल कंपनियां टेस्ला समेत सभी कारों के आयात पर शुल्क घटाने का विरोध करती रही हैं।  करीब तीन साल पहले जब भारत में टेस्ला ने आयात शुल्क घटाने हेतु लॉबिंग शुरू की थी, तब तक देश में इलेक्ट्रिक कारों का उत्पादन अत्यंत शैशवावस्था में था।  भारतीय कंपनियों का कहना था कि यदि इस स्थिति में टेस्ला की कारों के सीधे आयात के लिए आयात शुल्क घटाया जाता है, तो देश में विकसित इलेक्ट्रिक कारों के विकास में बाधा आयेगी।  तब भारत सरकार ने यह शर्त लगायी थी कि टेस्ला भारत में अपना उत्पादन केंद्र शुरू करेगी।  उसे 15 प्रतिशत के अत्यंत कम आयात शुल्क पर अधिकतम 8,000 कारों के आयात की अनुमति भी दी गयी थी।

अब आयात शुल्क घटाकर 70 फीसदी करने के साथ अधिकतम कारों की सीमा बढ़ाकर 50,000 करने का प्रस्ताव है।  साथ ही, देश में यह बहस भी शुरू हुई है कि टेस्ला को कम आयात शुल्क पर अधिक कारें आयात करने की अनुमति देने से देश में इलेक्ट्रिक कारों के विनिर्माण पर क्या असर पड़ सकता है? भारतीय ईवी उद्योग तेजी से बढ़ रहा है।  इसके बाजार का आकार 20 फीसदी वार्षिक से भी अधिक तेजी से 2032 तक करीब 118 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। हालांकि अभी कुल वाहन बिक्री में ईवी की हिस्सेदारी मात्र पांच फीसदी ही है, पर दोपहिया और तिपहिया वाहनों की श्रेणियों में ईवी को तेजी से अपनाने के कारण यह संख्या 2030 तक 40 फीसदी तक पहुंचने की उम्मीद है।  इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने और विनिर्माण के लिए दृढ़ और अनुकूल सरकारी नीतियां रही हैं।  इलेक्ट्रिक दोपहिया और तिपहिया वाहनों की बढ़ती मांग ईवी उद्योग के लिए प्रेरक शक्ति रही है।  बैटरी की लागत में भी भारी कमी आयी है, जिससे इलेक्ट्रिक वाहनों की कीमतें कम हुई हैं।  चार पहिया वाहनों के क्षेत्र में टाटा मोटर्स और महिंद्रा एंड महिंद्रा प्रमुख खिलाड़ी हैं, जबकि दोपहिया वाहनों के क्षेत्र में ओला बड़ी खिलाड़ी के रूप में उभरी है।  टेस्ला कारों पर शुल्क में कटौती के बाद भी इनकी ऑन-रोड कीमत 45 लाख रुपये से दो करोड़ रुपये के बीच होगी।  दूसरी ओर, भारतीय ईवी कारों की कीमत आठ लाख से 20 लाख रुपये के बीच है।  इसलिए यह सच नहीं है कि टेस्ला कारों के आने से भारतीय इलेक्ट्रिक कारों के उत्पादन और बिक्री पर बुरा असर पड़ेगा।
केंद्र सरकार विभिन्न तरीके से इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग को बढ़ावा दे रही है।  वित्तीय प्रोत्साहनों में हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों के तेजी से अपनाने और विनिर्माण की (एफएएमइ इंडिया) योजना शामिल है, जो ईवी की खरीद और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करती है।  इसके अलावा ईवी पर जीएसटी को 12 फीसदी से घटाकर पांच फीसदी कर दिया गया है।  इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद पर कुछ सीमा तक सब्सिडी भी दी जाती है।  डिजिटल लेन-देन जैसे कुशल चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर स्थापित करने के लिए भी सरकार प्रोत्साहन दे रही है।  ईवी और उनके घटकों के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआइ) योजना शुरू की गयी है।  इस साल तक ईवी के लिए 2। 7 लाख सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन स्थापित करने का लक्ष्य भी रखा गया है।  राज्यों द्वारा भी ईवी नीतियां लागू की जा रही है, जिसमें 50 प्रतिशत राज्यों की अपनी ईवी नीतियां हैं।  इनमें ईवी खरीद के लिए वित्तीय प्रोत्साहन, रोड टैक्स और कार पंजीकरण शुल्क से छूट और ईवी खरीद के लिए कम ऋण ब्याज दरें शामिल हैं।  दिल्ली और कई अन्य राज्यों में ईवी को रोड टैक्स के भुगतान से छूट दी गयी है।
आयातित कारों पर शुल्क कम करने के सरकार के फैसले के बाद ऐसा लग रहा है कि टेस्ला भारतीय ईवी बाजार का एक बड़ा हिस्सा छीन सकती है।  लेकिन सच्चाई यह है कि शुल्क कम करने के बाद भी टेस्ला भारत में अधिकतम 50,000 वाहन ही बेच सकती है।  दूसरी ओर, चीनी दिग्गज पहले ही देश में ईवी बाजार के बड़े हिस्से पर कब्जा जमा चुके हैं।  भारत में चीनी ईवी खिलाड़ियों में अमेरिकी अरबपति वॉरेन बफेट द्वारा समर्थित बीवाइडी शामिल है।  कुछ अन्य चीनी कंपनियां भी भारत में अपना विनिर्माण स्थापित करने की कोशिश में हैं, हालांकि, चीनी निवेश पर खासी सख्ती की गयी है।  इसके बावजूद चीनी कंपनियां अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ साझेदारी करके इन चुनौतियों से निपटने के तरीके खोज रही हैं।  दूसरी ओर, इलेक्ट्रिक वाहनों के कलपुर्जों के मामले में चीन से अब भी बड़ी चुनौती मिल रही है।  भारतीय कंपनियों ने बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक कारों का निर्माण तो शुरू कर दिया है, लेकिन इनके कलपुर्जों, खासकर बैटरी और मोटरों के लिए इन कंपनियों की बहुत बड़ी निर्भरता बनी हुई है।
इस बार के बजट में केंद्र सरकार ने इन कलपुर्जों के निर्माण के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण कच्चे माल पर बुनियादी सीमा शुल्क घटाकर इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए बैटरी और मोटरों के घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करने का गंभीर प्रयास किया है।  ऐसे में, यह माना जा सकता है कि आने वाले वर्षों में, आत्मनिर्भर भारत रणनीति के तहत इलेक्ट्रिक वाहनों के उत्पादन में देश आत्मनिर्भरता की ओर आगे बढ़ेगा।

(आलेख में व्यक्त लेखक के निजी विचार हैं)
(मेरोउत्तराखण्ड.इन इनका समर्थन नहीं करता है)

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