अशोक शर्मा
प्रयागराज महाकुंभ सफलता के साथ संपन्न हो गया। करीब 46 दिन चले महाकुंभ में, जैसा कि दावा किया जा रहा है,लगभग 60 करोड़ लोगों ने शिरकत की है। यदि प्रयागराज के मौनी अमावस्या के हादसे और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हुई भगदड़ को छोड़ दें तो महाकुंभ को मोटे तौर पर सफल ही कहा जाएगा। इस सफलता का मुख्य श्रेय हमारी सनातन आस्था को है। यह आस्था ही है, जिसके कारण करोड़ों श्रद्धालु बिना किसी निमंत्रण और बुलावे के तमाम त$कलिफों और परेशानियों के साथ त्रिवेणी संगम पर डुबकी लगाने के लिए चले आते हैं। बहरहाल, महाशिवरात्रि तक महाकुंभ में 70 से ज्यादा देशों के करोड़ों श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगा चुके हैं । 60 करोड़ जितनी संख्या अमेरिका और कनाडा की कुल जनसंख्या से भी ज्यादा है। दरअसल, विश्व में इतना बड़ा सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक आयोजन भारत के अलावा कहीं नहीं होता। बहरहाल,इस आयोजन में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जो समर्पण दिखाया और प्रशासनिक तंत्र, पुलिस, अर्धसैनिक बलों तथा गैर-सरकारी संगठनों के स्वयंसेवकों ने जो मेहनत की, उसकी भी प्रशंसा होनी चाहिए। ऐसे बड़े आयोजनों में कुछ न कुछ कमियां रह जाती हैं। कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं भी हुई हैं। उनकी जांच जारी है, लेकिन राजनीतिक दलों को अवांछनीय टिप्पणियों से बचना चाहिए। ऐसा करने से आयोजन को सुचारु रूप से संपन्न कराने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों-कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता है। महाकुंभ दरअसल,संपूर्ण मानवता का महामिलन है। यह भारतीय सनातन की अद्भुत विविधता, उसकी सांस्कृतिक समृद्धि और आध्यात्मिक गांभीर्य का जीवंत उदाहरण है। महाकुंभ हिंदू आस्था, हिंदू अस्मिता और हिंदू आत्मगौरव का संकेत है। यह विविधता में एकता के कथ्य को रेखांकित करता है। जाहिर है महाकुंभ के सफल आयोजन में देश-विदेश से पधारे असंख्य श्रद्धालुओं, अखाड़ों, महामंडलेश्वरों, संत-महात्माओं और आमजन ने जिस अनुशासन का परिचय दिया, वह दुर्लभ है। भले ही लोगों को महाकुंभ पहुंचने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन महाकुंभ परिसर में पहुंच कर लोगों को एक अलौकिक अनुभूति हुई। इस सफल आयोजन के कुछ संकेत हैं। एक, भारत में देशाटन और वैश्विक पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। जैसे-जैसे देश में मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग में आर्थिक समृद्धि बढ़ रही है, लोगों में धार्मिक सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक धरोहरों को देखने की ललक बढ़ रही है। पहले हम अपनी धार्मिक सांस्कृतिक धरोहरों की वैश्विक स्तर पर समुचित ‘मार्केटिंग’ नहीं कर सके थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह महति काम किया है। जिस तरह वो विदेश में प्रवासी भारतीयों और विदेशी पर्यटकों को भारत आने का आह्वान करते हैं, उससे देश को लाभ हुआ है। मान लीजिए महाकुंभ में 50 करोड़ की संख्या पर यदि 10 हजार प्रति-व्यक्ति द्वारा औसत व्यय मानें तो इससे अर्थव्यवस्था में पांच लाख करोड़ का योगदान हुआ।
इससे स्पष्ट है कि भारत के धार्मक-सांस्कृतिक स्थलों को पर्यटन स्थलों के रूप में विकसित कर उन्हें आर्थिक विकास के संवाहक के रूप में तराशा जा सकता है। ‘एक जिला, एक-पर्यटन स्थल, एक-उत्पाद’ या ‘एक-ब्लाक, एक पर्यटन स्थल, एक-उत्पाद’ जैसी योजनाएं हर गांव और शहर की आर्थिक समृद्धि में क्रांति ला सकती हैं। कुल मिलाकर महाकुंभ से निकले संकेतों में अध्यात्म, संस्कृति, राजनीति, अर्थव्यवस्था और प्रबंधकीय कौशल के महत्वपूर्ण संदेश छिपे हुए हैं।
महाकुंभ और सनातन आस्था
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