आम आदमी पार्टी (आप) के क्रियाकलाप पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट अंतत: दिल्ली विधानसभा के पटल पर रख दी गई।
कुल चौदह मामलों पर कैग ने रिपोर्ट तैयार की हैं, लेकिन जिस रिपोर्ट पर सबकी नजर लगी थीं, वह आबकारी नीति के संबंध में है। इस रिपोर्ट में शराब नीति को लेकर कोई व्यवस्था जितनी तरह की लापरवाहियां बरत सकती है, जितनी तरह की अनियमितताएं कर सकती है, और विभिन्न हित समूहों के लिए भ्रष्टाचार की जितनी गुंजाइशें छोड़ी जा सकती हैं, उन सबका उल्लेख किया गया है।
पुरानी नीति की प्रक्रियागत खामियों को दूर करने के लिए ही नई नीति का मसौदा तैयार किया था लेकिन नई नीति के क्रियान्वयन में विशेषज्ञ समिति के अनेक सुझावों को दरकिनार किया गया। दिल्ली में शराब वितरण केंद्रों की न केवल संख्या बढ़ा दी गई, बल्कि वितरण उन क्षेत्रों में भी पहुंचा दिया गया जहां पहले प्रतिबंधित था यानी स्कूल और आवासीय परिसरों के निकट। उत्पादन और वितरण की एजेंसियों का भी मनमाने ढंग से चयन किया गया।
उन संस्थाओं को ठेके दे दिए गए जो पात्रता नहीं रखती थीं और रखती भी थीं तो उन्हें जरूरत से ज्यादा खुदरा विक्रय केंद्र आवंटित कर दिए गए। रिपोर्ट में यह उल्लेख स्पष्ट है कि शराब नीति में हेरा-फेरी और उसके क्रियान्वयन में जो तौर-तरीके अपनाए गए उनके चलते लगभग दो हजार करोड़ रुपये से ज्यादा नुकसान दिल्ली सरकार को हुआ।
यह तभी हो सकता है, जब नुकसान की राशि का कुछ न कुछ हिस्सा उन लोगों के पास पहुंचा हो जिन्होंने नुकसान होने दिया और इसी ने ईडी, सीबीआई जैसी एजेंसियों के लिए जांच की स्थितियां तैयार कीं जिसके कारण तबके मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और सांसद संजय सिंह जैसे लोगों को जेल जाना पड़ा।
यह रिपोर्ट लोक लेखा समिति को भेज दी गई है। उसकी रिपोर्ट मिलने पर शेष स्थितियां उजागर होंगी। लेकिन आप की सरकार अपने ऊंचे-ऊंचे वादों, विचारों के पैमानों पर असफल हुई और दुखद यह है कि पराजय के बाद भी उसके नेताओं ने सबक नहीं लिया है। वे शुद्ध राजनीति पर लौटने की बजाय हंगामा खड़ा करने में अब भी ज्यादा भरोसा किए हुए हैं।
शराब नीति में हेरा-फेरी
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