सुकरात प्राचीन ग्रीस के महान दार्शनिक थे। उनकी विद्वता, तर्कशक्ति और विनम्रता के कारण वे अत्यंत प्रतिष्ठित थे। वे तर्क और ज्ञान की कसौटी पर हर बात को परखने में विश्वास रखते थे। उनकी एक प्रसिद्ध कथा हमें यह सिखाती है कि हमें व्यर्थ की बातों और कार्यों से क्यों बचना चाहिए।
एक दिन सुकरात बाजार से गुजर रहे थे। तभी उनका एक परिचित उनसे मिला। उसने सुकरात को नमस्कार किया और अत्यंत उत्सुकता से बोला,
“क्या आप जानते हैं कि कल आपके मित्र ने आपके बारे में क्या कहा?”
सुकरात ने शांत भाव से उसकी बात को बीच में ही रोक दिया और बोले,
“मित्र, मैं अवश्य तुम्हारी बात सुनूंगा, परंतु पहले मेरे तीन प्रश्नों का उत्तर दो।”
वह व्यक्ति चकित रह गया लेकिन सुकरात के ज्ञान और तर्कशीलता से परिचित होने के कारण उसने सहमति जताई।
सुकरात ने पूछा,
“जो बात तुम मुझे बताने जा रहे हो, क्या वह पूर्ण रूप से सत्य है?”
उस व्यक्ति ने कुछ देर सोचा और फिर संकोच से उत्तर दिया,
“नहीं, मैंने यह बात केवल सुनी है, लेकिन मुझे इसका सत्यता का पूर्ण ज्ञान नहीं है।”
सुकरात मुस्कराए और बोले,
“इसका अर्थ यह हुआ कि तुम्हें स्वयं नहीं पता कि यह बात सच है या नहीं।”
फिर सुकरात ने दूसरा प्रश्न पूछा,
“क्या यह बात मेरे लिए अच्छी या हितकारी है?”
उस व्यक्ति ने तुरंत उत्तर दिया,
“नहीं, यह बात आपके लिए अच्छी नहीं है। बल्कि इससे आपको दुख ही होगा।”
इस पर सुकरात बोले,
“तो इसका अर्थ यह हुआ कि यह बात न तो सत्य है और न ही मेरे लिए हितकारी।”
इसके बाद सुकरात ने तीसरा प्रश्न पूछा,
“जो बात तुम बताने जा रहे हो, क्या वह मेरे किसी कार्य में सहायक होगी?”
व्यक्ति ने ईमानदारी से उत्तर दिया,
“नहीं, इसका आपके किसी काम से कोई संबंध नहीं है।”
सुकरात की सीख
तीनों उत्तर सुनने के बाद सुकरात मुस्कराए और बोले,
“तो ऐसी बात को सुनने का क्या लाभ, जो न सत्य है, न उपयोगी और न ही लाभकारी? और मित्र, तुम्हारे लिए भी यह सीख है कि जिस बात का न तुम्हारे जीवन में कोई उपयोग हो, न कोई लाभ, और जिसकी सत्यता पर संदेह हो, ऐसी बातें करना भी व्यर्थ है।”
सुकरात की यह बात सुनकर वह व्यक्ति लज्जित हो गया और बिना कुछ कहे वहां से चला गया।
कथा से प्राप्त शिक्षा
इस कथा से हमें यह महत्वपूर्ण शिक्षा मिलती है कि हमें व्यर्थ की बातों और कार्यों में अपनी ऊर्जा तथा समय नष्ट नहीं करना चाहिए। हम अक्सर ऐसी चर्चाओं और अफवाहों में उलझ जाते हैं, जिनका न तो कोई प्रमाण होता है, न ही कोई लाभ। इसीलिए हमें ध्यान रखना चाहिए कि जो भी बात हम सुनें या कहें, वह सत्य, हितकारी और उपयोगी हो।
अगर हम इस सिद्धांत का पालन करें, तो हम न केवल अनावश्यक चिंताओं से बच सकते हैं, बल्कि अपने समय और ऊर्जा का सदुपयोग कर सकते हैं। यही एक सफल और सार्थक जीवन का मार्ग है।
अस्वीकरण
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