बिहार विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले ही निर्वाचन आयोग स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) करवा रहा है। उसका कहना है कि कानून व संविधान के तहत उसे यह अधिकार प्राप्त है कि नागरिकता से जुड़े दस्तावेज मांग सकता है ताकि नागरिकों को उचित मताधिकार मिल सके।
विपक्ष का आरोप है, आयोग इसकी आड़ में नागरिकता की जांच कर रहा है। वे इस पर कानूनी व वैधानिक सवाल भी उठा रहे हैं।
आयोग ने शीर्ष अदालत को दिए 88 पन्नों के हलफनामे में इस प्रक्रिया के तहत किसी की नागरिकता इस आधार पर न समाप्त करने की बात है कि उसका नाम मतदाता सूची के बाहर हो गया। पहचान के सीमित उद्देश्य के लिए आधार, मतदाता-पत्र व राशन-कार्ड पर विचार करने की बात भी की है।
आयोग के आदेशानुसार आठ करोड़ मूल बिहारियों को मतदाता सूची में शामिल रहने के लिए 25 जुलाई तक गणना फॉर्म भर कर जमा करना है जिसकी सूची पहली अगस्त को जारी की जा सकती है।
संविधान के अनुच्छेद 325 के अनुसार किसी भी शख्स को केवल धर्म, नस्ल, जाति या लिंग के आधार पर मतदाता सूची से बाहर नहीं किया जा सकता। कानूनन देश का प्रत्येक नागरिक, जो 18 साल या उससे अधिक है, मतदाता के तौर पर पंजीकरण करा सकता है।
इसमें सिर्फ गैर-नागरिक को नाम दर्ज कराने के अयोग्य ठहराया गया है। सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले में स्पष्ट कर चुका है कि मताधिकार केवल संवैधानिक अधिकार है, मौलिक अधिकार नहीं। मगर भारतीय नागरिक होने के बावजूद उसे शत्रे पूरी करनी होती है, और आवश्यक दस्तावेज देने होते हैं।
आयोग की मंशा पर उंगली उठाने वालों का आरोप है कि गणना फार्म में मांगे गए दस्तावेज में आधार, मतदाता-पत्र व राशन-कार्ड का न शामिल होना संदेह उपजाता है।
चूंकि सरकार आधार को केवल पहचान-पत्र मान रही है, इसलिए यह संशय उठा है। यदि जल्द ही आयोग इसमें सुधार कर ले तो शायद इन आरोपों-प्रत्यारोपों से बचा जा सकता है। आयोग को अपनी छवि और स्वायत्तता का विशेष ख्याल रखना होगा। भारत लोकतांत्रिक देश ही नहीं है, दुनिया के समक्ष मताधिकार की ताकत की मिसाल भी पेश करता है।
खास मतदाताओं को उनके अधिकार से वंचित करने की किसी राजनीतिक दल की साजिश का हिस्सा बनने से उसे न सिर्फ बचना होगा, बल्कि अपने पूर्ववर्तियों के नक्शे-कदम पर चल कर सख्त रवैया अपनाते हुए लोकतंत्र का रक्षा कवच बनने से भी हिचकिचाना नहीं चाहिए।
एसआईआर पर उठते वैधानिक सवाल
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