धर्म का अर्थ खुद को भूल जाना नहीं है। धर्म का मतलब है – स्वयं को पूरी तरह पहचान लेना। जब इंसान अपने आप को भूल जाता है, किसी और में खो जाता है, तो वह सच्चा धर्म नहीं होता। असली धर्म है खुद को अपनी पूर्णता में समझना और पहचानना।
बहुत लोग सोचते हैं कि धर्म की राह पर चलने के लिए ज्ञान जरूरी है। लेकिन सच यह है कि ज़्यादा ज्ञान अक्सर बोझ बन जाता है। मन इतना उलझ जाता है कि सत्य तक पहुँच पाना मुश्किल हो जाता है। ज्ञान अगर रास्ता नहीं है, तो क्या भक्ति और कल्पना रास्ता हैं? जवाब है – नहीं। भक्ति भी मन की कल्पना और स्वप्न ही है।
ज्ञान तर्क पर आधारित होता है और भक्ति कल्पना पर। मनुष्य का मन या तो तर्क करता है या सपने देखता है। सपने और कल्पनाएँ केवल वही दिखाते हैं, जो हम देखना चाहते हैं – न कि सच्चाई। उदाहरण के लिए, अगर कोई हिंदू भगवान की कल्पना करता है, तो उसका भगवान उसी की जाति-समाज जैसा दिखता है। कोई नीग्रो करता है, तो उसका भगवान घुँघराले बाल और मोटे होंठों वाला होगा। चीनी की कल्पना में भगवान पीली त्वचा और चपटी नाक वाले होंगे। यानी मनुष्य अपने भगवान को भी अपनी ही कल्पना के अनुसार गढ़ लेता है।
यह कल्पना सुख जरूर देती है, लेकिन यह वास्तविक नहीं होती। जैसे कोई व्यक्ति समाज, राष्ट्र या धर्म के नाम पर खुद को भुला देता है और उसमें डूब जाता है, तो उसे नशे जैसा सुख मिलता है। दुख और पीड़ा से कुछ देर के लिए छुटकारा मिल जाता है। भक्त भी यही करता है – वह किसी काल्पनिक भगवान के चरणों में अपने को भूल जाता है और उसमें सुख खोजता है। पर यह सुख असली नहीं होता, यह केवल कल्पना है।
सत्य तक पहुँचने के लिए ज्ञान का बोझ या भक्ति की कल्पना – दोनों की ज़रूरत नहीं है। सत्य वहीं मिलता है, जहाँ इंसान सभी कल्पनाओं और तर्कों को छोड़कर खुद को अपनी संपूर्णता में पहचान लेता है। असली धर्म आत्म-स्मरण है, न कि आत्म-विस्मरण।
डिसक्लेमर :-
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