शाकम्भरी माँ: वह दिव्य स्वरूप जिसने अकाल में बरसाया था अन्न और जल

माँ दुर्गा ने संसार की रक्षा के लिए अनेक रूप धारण किए हैं, जिनमें से एक सबसे अद्भुत और करुणामय रूप है शाकम्भरी का। यह वह रूप है जो सम्पूर्ण सृष्टि के पोषण और पालन का प्रतीक है। माँ के इस स्वरूप की कथा यह समझाती है कि कैसे उन्होंने अपनी दिव्य शक्ति से समस्त मानव जाति को भयंकर अकाल से बचाया था।

हम माँ दुर्गा को प्रायः शक्ति, काली या महिषासुर मर्दिनी के उग्र रूप में जानते हैं, जो यह सिखाते हैं कि बुराइयों का विनाश आवश्यक है। परन्तु माँ का शाकम्भरी स्वरूप उनके कोमल, ममतामयी और पोषण करने वाले चेहरे को दर्शाता है। इन्हें वनस्पति और अन्न की अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब पृथ्वी पर भीषण सूखा पड़ा और अन्न व जल का लोप हो गया, तब माँ ने इसी रूप में अवतार लेकर अपने भक्तों को संकट से उबारा।

कैसे हुआ शाकम्भरी देवी का प्राकट्य?

एक समय की बात है, जब संसार में घोर अकाल पड़ा। वर्षों तक वर्षा न होने के कारण नदियाँ और कुएँ सूख गए, खेत बंजर हो गए और अन्न का एक दाना तक न बचा। लोग और पशु-पक्षी भूख-प्यास से तड़पने लगे। ऐसे में साधना करने वाले ऋषि-मुनि भी कमजोर हो गए। तब संकट की इस घड़ी में, माँ भगवती दुर्गा ने शाकम्भरी के रूप में प्रकट होकर सबको आश्वस्त किया। माँ ने कहा कि जब-जब धरती पर अन्न और जल का संकट होगा, वे इसी रूप में आकर सबका पालन-पोषण करेंगी। माँ ने अपने दिव्य शरीर से हरी सब्जियाँ (शाक), फल, फूल, जड़ें, कंद और जल की धाराएँ प्रवाहित कीं, जिससे समस्त प्राणियों का उद्धार हुआ।

शाकम्भरी नाम का क्या है अर्थ?

इनके नाम का विभाजन करें तो ‘शाक’ का अर्थ है सब्जी या वनस्पति और ‘अम्भरी’ का अर्थ है धारण करने वाली या पालन करने वाली। इस प्रकार, ‘शाकम्भरी’ का मतलब हुआ वह देवी जो वनस्पतियों और अन्न को धारण करती हैं तथा उनका पोषण करती हैं। माँ शाकम्भरी की पूजा-अर्चना मुख्य रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में होती है। सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) का प्रसिद्ध मंदिर और कर्नाटक के बेलगाम स्थित शक्तिपीठ इनके प्रमुख स्थान हैं। नवरात्रि की सप्तमी और अष्टमी तिथि को इनकी विशेष पूजा की जाती है, जहाँ भक्त तरह-तरह के अन्न, फल और शाक (सब्जियाँ) चढ़ाकर माँ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

माँ के स्वरूप की क्या है विशेषता?

शाकम्भरी देवी का स्वरूप अत्यंत दयालु और करुणामय है। कहा जाता है कि माँ की आँखों से जो अश्रु बहते हैं, वे ही वनस्पतियों और जलवर्षा के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। उनका वर्ण नीला है और उनकी चार भुजाओं में विभिन्न प्रकार के अन्न, फल और सब्जियाँ विद्यमान हैं। माँ प्रकृति की गोद में विराजमान हैं और उनके वस्त्र लताओं, पत्तियों और जड़ी-बूटियों से निर्मित हैं।

माँ की उपासना के क्या हैं लाभ?

माँ शाकम्भरी की कृपा से घर-परिवार में कभी भी अन्न या धन की कमी नहीं होती। मान्यता है कि सूखाग्रस्त इलाकों में माँ का स्मरण करने से जल के नए स्रोत प्राप्त होते हैं। उनकी आराधना से पर्यावरण और मनुष्य के बीच का संतुलन बना रहता है तथा प्रकृति के साथ तालमेल बैठाकर जीवन जीने की प्रेरणा मिलती है। संक्षेप में, शाकम्भरी देवी केवल एक देवी ही नहीं, बल्कि समस्त धरा का पोषण करने वाली माता का स्वरूप हैं, जिनकी कृपा से ही इस पृथ्वी पर जीवन संभव है।

डिसक्लेमर :-
इस लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सटीकता या विश्वसनीयता की गांरंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, पंचांग, मान्यताओं या फिर धर्मग्रंथों से संकलित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है। इसके सही और सिद्ध होने की प्रामाणिकता नहीं दे सकते हैं। इसके किसी भी तरह के उपयोग करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।

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