देहरादून/पिथौरागढ़, 15 सितंबर 2025: उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की रहने वाली सात वर्षीय मासूम ‘नन्हीं परी’ की दर्दनाक मौत को दस साल बीत चुके हैं, लेकिन उसके परिवार का दर्द आज भी ताजा है। 2014 की उस क्रूर घटना ने न केवल एक परिवार को तोड़ दिया, बल्कि पूरे समाज को झकझोर दिया था। आज भी पिता महेश चंद की आंखों में वही आंसू हैं, वही बेटी की यादें जो न्याय की गुहार लगाती हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को लिखे एक भावुक पत्र में महेश चंद ने राज्य सरकार से गुहार लगाई है कि सुप्रीम कोर्ट में तुरंत रिट याचिका दायर की जाए, ताकि दोषियों को सख्त से सख्त सजा मिल सके। उन्होंने कहा, “यह सिर्फ मेरी बेटी की लड़ाई नहीं, बल्कि उत्तराखंड की हर बेटी की सुरक्षा का सवाल है।”
यह मामला 20 नवंबर 2014 का है, जब नन्हीं परी अपने परिवार के साथ हल्द्वानी के कालाढूंगी इलाके में रिश्तेदारों के विवाह समारोह में शामिल होने गई थी। समारोह की रौनक में खोई मासूम अपने साथियों के साथ खेल रही थी, लेकिन अचानक वह गायब हो गई। पूरे इलाके में सनसनी फैल गई। पांच दिनों तक सघन तलाश चली, लेकिन 25 नवंबर को कालाढूंगी के जंगल में उसका शव मिला – खून से लथपथ। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने साफ कर दिया कि उसके साथ दुष्कर्म हुआ था, उसके बाद क्रूरता से हत्या कर दी गई। यह घटना उत्तराखंड में बाल यौन शोषण और हत्या के सबसे जघन्य मामलों में से एक बन गई, जिसने तत्कालीन हरीश रावत सरकार को हिला दिया था।
परिवार के अनुसार, शुरुआती जांच में पुलिस की लापरवाही के कारण कई सुराग छूट गए, लेकिन मामला पास्को कोर्ट पहुंचा। विशेष अदालत ने मुख्य आरोपी को फांसी की सजा और सह-आरोपी को पांच वर्ष की सश्रम कारावास की सजा सुनाई। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा, जो पीड़ित परिवार के लिए एक बड़ी राहत थी। लेकिन दर्द तब और गहरा हो गया जब सुप्रीम कोर्ट में अपील के दौरान राज्य सरकार की ओर से रिट याचिका दाखिल करने में गंभीर चूक हुई। महेश चंद का आरोप है कि सरकार ने न तो समय पर जानकारी दी और न ही शीर्ष अदालत में प्रभावी पैरवी की। परिणामस्वरूप, दोषियों की सजा पर सवाल उठने लगे और मामला लंबित हो गया।
महेश चंद ने पत्र में तीन प्रमुख मांगे रखी हैं:
तुरंत रिट याचिका दाखिल करें: राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर कर दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करे। पिता का कहना है कि फांसी की सजा को बरकरार रखना जरूरी है, वरना अपराधियों को संदेश जाएगा कि वे बच निकल सकते हैं।
विशेष पैनल गठित करें: सुप्रीम कोर्ट में मामले की निगरानी और पैरवी के लिए वरिष्ठ अधिवक्ताओं का एक विशेष पैनल बनाया जाए, जो संवेदनशीलता के साथ काम करे।
भविष्य के लिए पारदर्शिता: ऐसी संवेदनशील घटनाओं में सरकार पूरी जिम्मेदारी और पारदर्शिता बरते, ताकि पीड़ित परिवारों को न्याय मिल सके और ऐसी त्रासदियां दोबारा न हों।
महेश चंद ने पत्र में लिखा, “मेरी नन्हीं परी को न्याय दिलाना सिर्फ मेरे परिवार का मुद्दा नहीं है, बल्कि उत्तराखंड की हर बेटी और बहन की सुरक्षा और सम्मान का सवाल है। यदि आज दोषियों को सुप्रीम कोर्ट से सजा नहीं मिली, तो यह पूरे समाज के लिए शर्मनाक होगा।” उन्होंने भावुक होकर कहा, “मेरी बिटिया की चीखें आज भी मेरे कानों में गूंजती हैं। वह शादी की खुशियों में खेल रही थी, लेकिन दरिंदों ने उसकी जिंदगी छीन ली। सरकार से अपील है कि अब और देरी न करें, दोषियों को सुप्रीम कोर्ट से सख्त सजा दिलाएं, ताकि नन्हीं परी की आत्मा को शांति मिले और बेटियों में न्याय की उम्मीद जिंदा रहे।”
उम्मीद है कि इस बार नन्हीं परी के परिवार को न्याय मिलेगा, जो न केवल एक त्रासदी का अंत होगा, बल्कि भविष्य की बेटियों के लिए एक मजबूत संदेश भी। यह घटना याद दिलाती है कि न्याय में देरी, न्याय का हनन है।

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