मुख्यमंत्री महिला सतत् आजीविका योजना: भ्रष्टाचार के साये में

300 महिलाओं का 1.26 करोड़ का अनुदान फंसा

देहरादून। उत्तराखंड सरकार की महत्वाकांक्षी ‘मुख्यमंत्री महिला सतत् आजीविका योजना’ की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठ गए हैं। उत्तराखंड कांग्रेस की प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया है कि राज्य सरकार की महिला सशक्तिकरण की योजना को एनजीओ के गठजोड़ ने पलीता लगा दिया है। उन्होंने दावा किया कि देहरादून के रायपुर और मालदेवता क्षेत्र की करीब 300 महिलाओं को ट्रेनिंग देने के तीन साल बाद भी 1.26 करोड़ रुपये का अनुदान नहीं मिल पाया है।

योजना का उद्देश्य और जमीनी हकीकत
यह योजना निराश्रित, विधवा और निर्बल वर्ग की महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने के लिए बनाई गई थी। इसके तहत, पात्र महिलाओं को प्रशिक्षण देने के बाद 50,000 रुपये तक का अनुदान दिया जाना था। लेकिन, दून के रायपुर ब्लॉक के बजेत, सिरकी, रामनगर डांडा, मीडावाला, दुधियावाला व डांडी क्षेत्रों में ट्रेनिंग प्राप्त करने वाली महिलाओं को आज भी खाली हाथ रहना पड़ रहा है। दसौनी ने आरोप लगाया कि महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास विभाग ने अनुदान की राशि एक एनजीओ को दे दी, लेकिन संस्था ने लाभार्थियों को अभी तक कोई सामग्री या सहायता नहीं दी है।

अधिकारी-एनजीओ गठजोड़ का आरोप
गरिमा दसौनी ने इसे सरकार में बैठे अधिकारियों और संस्था के बीच का “गठजोड़” बताया। उन्होंने कहा कि विभाग ने जून 2025 में एनजीओ को नोटिस जारी कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया, जबकि संस्था ने नोटिस के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की। सूत्रों के हवाले से दसौनी ने यह भी बताया कि इस संस्था को विधानसभा में बैठे एक अधिकारी का संरक्षण प्राप्त है, जिससे उसकी मनमानी बढ़ती जा रही है। उन्होंने इस पूरे मामले को भ्रष्टाचार का एक नया नमूना बताया, जहां जनकल्याणकारी योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित होकर रह गई हैं।

परिसंपत्तियों का इंतजार और महिलाओं की पीड़ा
इस योजना के तहत, महिलाओं को डेयरी और मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण दिया गया था। डेयरी के लिए उन्हें जर्सी या क्रॉस-ब्रीड गाय और अन्य उपकरण मिलने थे, जबकि मधुमक्खी पालन के लिए बी बॉक्स, हनी हार्वेस्टिंग किट आदि दिए जाने थे। लेकिन ट्रेनिंग के तीन साल बाद भी ये परिसंपत्तियां महिलाओं तक नहीं पहुंची हैं।
दसौनी ने महिलाओं की पीड़ा को सामने लाते हुए कहा कि कई महिलाओं ने अनुदान के चक्कर में अपने निजी खर्च पर गाय या अन्य पशु नहीं खरीदे, जिससे उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा है। महिलाओं का कहना है कि अगर योजना का लाभ तीन-चार साल बाद भी नहीं मिलता, तो उसका क्या औचित्य है? उन्होंने सरकार से इस मामले में गंभीरता दिखाने और केवल नाम के लिए योजनाएं चलाकर महिलाओं का शोषण न करने की अपील की।

जांच की मांग और अनियमितताएं
दसौनी ने बताया कि एक आरटीआई से यह खुलासा हुआ है कि योजना के अनुबंध पर एनजीओ के अध्यक्ष या सचिव की जगह प्रोजेक्ट मैनेजर के हस्ताक्षर हैं, जो एक बड़ी अनियमितता है। उन्होंने इस बात पर भी सवाल उठाया कि जब महिलाओं को अनुदान के बदले सीधे परिसंपत्ति दी जा रही है, तो किस नस्ल की गाय मिलेगी, इसकी जानकारी भी लाभार्थियों को नहीं दी गई। इससे योजना की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
कांग्रेस प्रवक्ता ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से अनुरोध किया है कि वे महिला सशक्तिकरण की बातें केवल मंच से न करें, बल्कि इन योजनाओं की जमीनी सच्चाई का व्यक्तिगत रूप से पता लगाएं और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें।

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