मन की शांति ही असली आनंद है

हमारे शास्त्रों में ऐसा वर्णन आता है कि मन ही बंधन और मोक्ष का कारण भी है। यही मन हमारा सबसे बड़ा दुश्मन हो सकता है, पर अगर हम चाहें तो यही मन हमारा सबसे प्रिय सखा भी हो सकता है।

मन हमारा मित्र बन सके, उसके लिए जरूरत है इसे समझने की। मन का स्वभाव है बहुत सोचना, बहुत विचारना। हम पूरे दिन इंद्रियों के माध्यम से जो भी ग्रहण करते हैं, वह हर चीज हमारे मन पर बहुत गहरा प्रभाव डालती है। फिर चाहे वह त्वचा के माध्यम से किसी वस्तु का स्पर्श हो या आंखों देखी कोई चीज। जब भी हम इंद्रियों के जरिये कुछ अनुभव करते हैं तो हमारे मन में एक दृश्य बन जाता है। वह उस विषय से संबंधित कोई पूर्व स्मृति हो सकती है या भविष्य की कोई कल्पना।
मनुष्य का मन शांत करना बहुत कठिन है क्योंकि एक के बाद एक मन में विषय का चिंतन चलता ही रहता है और विचारों की बाढ़ अक्सर ही आती रहती है। इन विषय रूपी लहरों के उठते ही इंसान क्या करने की सोचता है? उसे लगता है कि शायद थोड़ा घूम आएंगे तो अच्छा लगेगा, बहुत समय हो गया एक ही जगह पर बैठे हुए, कहीं चले जाते हैं। ऐसा सोच कर वह इंसान एक जगह से दूसरी जगह जाता है, फिर जब लौटता है तब भी मन असंतुष्ट और परेशान ही रहता है।

ऐसा क्यों? क्योंकि मन अगर अपने आप में, अपने आप से खुश नहीं है तो आप भले ही कहीं भी चले जाओ, वह खुश नहीं हो पाएगा। हमें लगता है सुख कहीं बाहर है, हम यह वस्तु प्राप्त कर लेंगे तो बहुत आनंद मिलेगा। हम इस जगह चले जाएंगे तो मन खुश होगा। पर क्या असल में ऐसा होता है? मन दो पल के लिए खुश होता है, पर फिर यह वापस उन विचारों में खो जाता है, जिनसे दूर भाग रहा था।

अगर आपका मन शांत है तो आप जहां हैं, वही संतुष्टि है। आपको जगह नहीं बदलनी पड़ती। लेकिन, अगर मन किसी भी कारणवश असंतुष्ट है या दुखी है, तो इसे ठीक करने की जिम्मेदारी हमारी है। इसे ठीक कैसे करें? जब हमारे जीवन में अनुशासन होता है तो हमारा मन संयमित हो जाता है। साधना के लिए एक नियम होना चाहिए। सुबह इतने बजे उठना है, फिर उठते ही कुछ समय अपनी साधना को देना है, फिर अपना जो भी काम है, उसे खूब मेहनत से करना है। दिनभर की जिम्मेदारी के बाद रात को मंत्र जप जरूर करना है। यह रोज का नियम होना चाहिए। एक संकल्प लेना चाहिए कि भले ही कोई परिवर्तन आए, हम अपना नियम नहीं तोड़ेंगे।

जब हम किसी भी चीज को पूर्ण समर्पण के साथ करते हैं, तो मन शांत होता है और शांति ही हमें संतुष्ट करती है। भक्ति और प्रेम भी जब समर्पण के साथ होता है, तो मन शांत और संतुष्ट हो जाता है। फिर इधर-उधर की चीजें सोचने का न समय बचता है, न इच्छा होती है। इसीलिए गुरु प्रेम, ईश्वर प्रेम और भक्ति से दिल में सुकून के पल लाते रहने चाहिए, मन को शांति सहज ही प्राप्त हो जाती है। शांत और संयमित मन ही आपका मित्र हो सकता है।

लेखक – आनंदमूर्ति गुरु मां

(सदगुरु आनंदमूर्ति गुरु मां, जिन्हें सप्रेम गुरु मां पुकारा जाता है, प्रख्यात और अग्रणी आध्यात्मिक गुरु होने के साथ-साथ एक कवियित्री और तर्कवादी भी हैं। इन्हें आधुनिक युगीन योगी कहा जाना गलत नहीं है। गुरु मां संस्कृत शब्द ‘गुरु’ का पर्याय हैं, जो लगातार मनुष्य को उदासीनता और निराशा के अंधकार से बाहर निकालने का कार्य कर रही हैं।)

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