उत्तराखंड की संस्कृति और शास्त्रीय संगीत का संगम: ‘विरासत’ महोत्सव का भव्य आगाज़

राज्यपाल ने किया शुभारंभ, उस्ताद अमजद अली खान के सरोद और मनमोहक छोलिया नृत्य ने बांधा समा

देहरादून। भारतीय लोक कला और सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित करने वाली लोकप्रिय संस्था रीच (REACH) के 30वें संस्करण “विरासत आर्ट एंड हैरिटेज महोत्सव” का भव्य शुभारंभ आज देहरादून में हो गया। ओएनजीसी के डॉ. भीमराव अंबेडकर स्टेडियम, कौलागढ़ रोड पर आयोजित महोत्सव का उद्घाटन महामहिम राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल श्री गुरमीत सिंह ने दीप प्रज्वलन और राष्ट्रगान के साथ किया। महोत्सव की पहली शाम भारतीय शास्त्रीय संगीत के दिग्गज उस्ताद अमजद अली खान के सरोद वादन और उत्तराखंड के पारंपरिक छोलिया नृत्य के नाम रही।

राज्यपाल ने विरासत को बताया प्रशंसनीय
शुभारंभ के अवसर पर राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल श्री गुरमीत सिंह ने विरासत महोत्सव को ‘अद्भुत और प्रशंसनीय’ बताया। उन्होंने कहा कि तीन दशक तक निरंतर विरासत को संजोए रखना एक महान कार्य है। उन्होंने राष्ट्र की प्रगति पर बल देते हुए कहा कि भारत विश्व गुरु बनने की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है, और हमें अपनी गौरवशाली सभ्यता, संस्कृति और मूल्यों को सदैव संजोए रखना है। उन्होंने प्रधानमंत्री द्वारा योग को वैश्विक स्तर पर पहुँचाने की सराहना करते हुए इसे देश के लिए गर्व का विषय बताया। इस अवसर पर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक भी शामिल हुए।


उस्ताद अमजद अली खान का जादुई सरोद वादन
समारोह की पहली शाम का आकर्षण विश्वविख्यात सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खान की प्रस्तुति रही। ग्वालियर के सेनिया घराने के वंशज और सरोद के आविष्कार का श्रेय प्राप्त इस परिवार से आने वाले खान साहब ने अपनी स्पष्ट, तेज़ और मधुर तानों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
पद्म विभूषण से सम्मानित इस महान कलाकार ने अपने समृद्ध करियर में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के इतिहास में राग हरिप्रिया कणाद और राग अमीरी तोड़ी जैसे कई नए रागों को शामिल किया है, जो उनकी रचनात्मकता को दर्शाते हैं। उनके साथ तबले पर पंडित मिथिलेश झा ने संगत दी, जो स्वयं बनारस घराने से दीक्षित हैं और जिन्हें कला संस्कृति विभाग का राज्य पुरस्कार भी प्राप्त है। साथ ही, जयपुर घराने के पंडित फतेह सिंह गंगानी ने भी अपनी कला का प्रदर्शन किया। उस्ताद अमजद अली खान ने देहरादून में अपनी प्रस्तुति से शास्त्रीय संगीत प्रेमियों का दिल जीत लिया।

युद्ध कला का प्रतीक ‘छोलिया नृत्य’
शास्त्रीय संगीत के साथ ही उत्तराखंड की लोक कला की अमिट छाप छोलिया नृत्य ने छोड़ी। उत्तराखंड की उद्यांचल कला समिति, अल्मोड़ा के 20 सदस्यों (चंदन आर्य, नवीन आर्य आदि) ने पारंपरिक वेशभूषा और उग्र भावों के साथ इस तलवार नृत्य का प्रदर्शन किया।
यह पारंपरिक लोक नृत्य शैली मूल रूप से उत्तराखंड के कुमाऊँ मंडल और नेपाल के पश्चिमी प्रांत में लोकप्रिय है। एक हज़ार साल से भी ज़्यादा पुराना यह नृत्य कुमाऊँ के युद्धरत क्षत्रियों-खस और कत्यूरियों के समय से चला आ रहा है, जब विवाह तलवारों की नोक पर होते थे। ढोल-नगाड़ों की युद्ध जैसी ताल पर नर्तकों ने नकली युद्ध का आभास कराते हुए अपनी तलवारें लहराईं, जिसने दर्शकों के मन में एक अमिट छाप छोड़ी।

आयोजन में गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति
विरासत महोत्सव के भव्य शुभारंभ अवसर पर रीच संस्था के संस्थापक सदस्य व महासचिव आरके सिंह, संयुक्त सचिव विजयश्री जोशी, उत्तराखंड के महालेखाकार मोहम्मद परवेज आलम, शिल्प निदेशक सुनील वर्मा, मीडिया कोऑर्डिनेटर प्रियवंदा अय्यर, और प्रदीप मैथिल सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। यह महोत्सव आने वाले दिनों में भारतीय कला और संस्कृति की विविध रंगों को प्रस्तुत करता रहेगा।

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