क्या पीड़ा का मूल कारण दूसरों द्वारा किया गया घाव ही होता है, या फिर उसे मन में संजोए रखने की प्रवृत्ति? स्वामी मुकुंदानंद जी बताते हैं कि क्षमाशीलता एक ऐसी शक्ति है जो न केवल पीड़ा से ऊपर उठने का संबल देती है, बल्कि हृदय का बोझ हल्का कर आत्मा को दिव्यता की ओर ले जाती है।
स्वामी मुकुन्दानन्द
हाइलाइट्स
- पीड़ा जैसी भी हो, यदि हम उसे मन में जकड़े रहें, तो वही हमें जकड़ लेती है। क्षमा करना ही आरंभ है—चित्त के उपचार और उत्थान का।
- क्षमा दूसरों पर उपकार नहीं, स्वयं को दिया गया उपहार है। यह शांति और स्पष्टता लाकर पीड़ादायक अध्यायों को विराम देती है।
- यदि आलोचना व मतभेदों का सामना दीनता से करें, तो वे आत्मविकास के उपकरण बनते हैं।
- कटुता को त्यागने से हमारा चरित्र परिपक्व होता है और भीतर की दिव्यता उजागर होती है।
- क्षमा निष्क्रियता नहीं, प्रतिदिन लिया जाने वाला एक साहसिक निर्णय है, जो हमें पीड़ा से मुक्त कर आत्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है।
कोमलता में निहित एक अदृश्य शक्ति
हम सब कभी न कभी ऐसे भावनात्मक आघातों से गुज़रे हैं जिन्हें भुला पाना सरल नहीं होता—कार्यस्थल के सहकर्मी का छल, किसी प्रियजन का साथ छोड़ जाना, या कोई कटु वचन जो समय बीतने पर भी हृदय को कुरेदता रहता है। ऐसी चोटें भीतर ही भीतर कड़वाहट, क्षोभ और मानसिक विषमता को जन्म देती हैं, और जीवन की न्यायशीलता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर देती हैं। पीड़ा कभी उचित भी प्रतीत होती है, परंतु उसे संजोए रखना धीरे-धीरे उसे विष में बदल देता है। क्षमा ही इसका उत्तर है—शांति और संतोष की आधारशिला।

बेड़ियों से मुक्ति
होलोकॉस्ट से जीवित बचे दो पीड़ितों की भेंट वर्षों बाद हुई। उनका वार्तालाप एक विचारोत्तेजक सीख देती है।
एक ने पूछा, “क्या तुमने उन्हें क्षमा कर दिया, जिन्होंने हमारे साथ वो अमानवीय व्यवहार किया?”
दूसरे ने शांत स्वर में कहा, “हाँ, मैंने उन्हें क्षमा कर दिया और उस पीड़ा से उभर चुका हूँ।”
पहला बोला, “मैं अब भी प्रतिशोध की आग में जल रहा हूँ।”
दूसरे ने गंभीरता से कहा, “तो इसका अर्थ है कि तुम अब भी उनके जेल में कैद हो।”
यही है क्षमा न करने का विरोधाभास—हम सोचते हैं दोषी को उत्तरदायी ठहरा रहे हैं, पर असल में उसकी स्मृति की बेड़ियों में स्वयं को बाँध लेते हैं। जब तक क्षमा नहीं करते, हम उसी पीड़ा से बंधे रहते हैं जिससे मुक्ति चाहते हैं। चाहे कोई क्षमा याचना कर ले, आंतरिक शांति तभी संभव है जब भीतर की विषमता त्याग दी जाए। कहा गया है—“बैर पालना ऐसा है जैसे विष पीकर दूसरों की मृत्यु की कामना करना।” अतः क्षमा दूसरों पर उपकार नहीं, स्वयं को दिया गया अमूल्य उपहार है।
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज अपने कीर्तन में एक गहन अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं।
“भूलिहुँ दुर्भावना कहुँ, हो न सपनेहुँ प्यारे।”
“स्वप्न में भी किसी के प्रति दुर्भावना न आने पाए—भूल से भी नहीं।”

कड़वाहट से करुणा की ओर
क्षमा करना वचनों में सरल है, व्यवहार में लाना कठिन। प्रायः इसे दुर्बलता समझा जाता है, जबकि यह सौम्यता में छिपी एक अपार शक्ति है—पीड़ा से ऊपर उठने का साहस और अहं छोड़, शांति को चुनने की बुद्धिमत्ता। इसका अर्थ अन्याय को स्वीकारना नहीं, बल्कि प्रतिशोध और कटुता के बोझ से स्वयं को मुक्त करने का सजग निर्णय है।
भगवद गीता में श्री कृष्ण कहते हैं:
तेज: क्षमा धृति: शौचमद्रोहोनातिमानिता |
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत || ~ 16.3
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