दस केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों ने शुक्रवार को केंद्र के श्रम कानूनों को रद्द कर चार नई श्रम संहिताओं को लागू करने की अधिसूचना जारी करने के निर्णय को श्रमिक विरोधी और नियोक्ता समर्थक करार देते हुए विरोध में आंदोलन की घोषणा की है।
इंटक, एटक, एचएमएस, सीटू, एआईयूटीयूसी, टीयूसीसी, सेव, एआईसीसीटीयू, एलपीएफ और यूटीयूसी ने जारी एक संयुक्त बयान में 44 श्रम कानून रद्द कर चार संहिताएं लागू करने को श्रमिक वर्ग के साथ किया गया धोखा करार दिया है।
अधिसूचना को मनमानी और अलोकतांत्रिक करार देते हुए यूनियनों के बयान में कहा गया है कि यह कदम सभी लोकतान्त्रिक मूल्यों के खिलाफ जाकर भारत के कल्याणकारी राज्य के किरदार को तार-तार करता है।
दस केन्द्रीय यूनियन और स्वतंत्र औद्योगिक फेडरेशन इन संहिताओं का शुरू से ही विरोध कर रही हैं। 2019 में जब 29 केन्द्रीय श्रम कानूनों के स्थान पर पारिश्रमिक संहिता बनाई गई तो तुरंत विरोध प्रदर्शन हुए थे और जनवरी 2020 में बड़ी आम हड़ताल हुई थी।
फिर 2020 में तीन और संहिताएं औद्योगिक संबंध संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता और कार्य सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य स्थितियाँ संहिता बनाई गई तो सितंबर 2020 में 26 नवंबर को ऐतिहासिक हड़ताल की गई, जिसके साथ संयुक्त किसान मोर्चा ने “चलो दिल्ली” आंदोलन किया गया। इसके बाद कई विरोध प्रदर्शन हुए जिनमें ताज़ा मामला 9 जुलाई 2025 की आम हड़ताल थी।
बयान के अनुसार इतने कड़े विरोध के बावजूद केंद्र सरकार ने बिहार विधानसभा चुनावों में जीत के मद में श्रम संहिताएं लागू करने की घोषणा की जबकि ट्रेड यूनियनों ने 13 नवंबर को सरकार की तरफ से मसौदा श्रम शक्ति पर नीति बुलाये गए भारतीय श्रम सम्मेलन में भी श्रम संहिताएं रद्द करने की मांग की थी। इससे पहले वित्त मंत्रालय के साथ बजट पूर्व बैठक में भी केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच ने श्रम संहिताएं रद्द करने की मांग की थी।
बयान के अनुसार सरकार ने कोई अपील न सुनते हुए और विरोध प्रदर्शनों, हड़तालों की परवाह न करते हुए नियोक्ताओं के प्रतिनिधियों व भारतीय मजदूर संघ और मुट्ठी भर समर्थकों की मानते हुए श्रम संहिताएं लागू करने की घोषणा कर दी है।
यूनियनों ने इस कदम को अलोकतांत्रिक, प्रगतिगामी, श्रमिक विरोधी और नियोक्ता समर्थक करार दिया और कहा कि इसे श्रमिक वर्ग की तरफ से कड़े विरोध का सामना करना पड़ेगा। यूनियनों ने कहा कि यह श्रमिकों के सारे अधिकार छीनकर उन्हें गुलामी की तरफ धकेलने की कोशिश है। संहिताएं लागू होने का मतलब आने वाली पीढ़ियों की उम्मीदों, विश्वास और आकांक्षाओं का गल घोंटने जैसा है।
यूनियनों ने श्रम संहिताएं और श्रम शक्ति नीति रद्द करने की मांग को लेकर श्रमिक वर्ग से संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में किसानों के साथ मिलकर से 26 नवंबर को देश भर में हर कार्यस्थल पर जिला मुख्यालयों पर प्रतिरोध दर्ज कराने का आह्वान किया है। इसके अलावा, यूनियनों ने अपने सदस्यों से आज से ही काली पट्टी लगाकर कार्यस्थलों पर अपना प्रतिरोध दर्ज कराने का आह्वान किया है। सोमवार से गेट मीटिंग, नुक्कड़ सभाओं, बस्तियों में सभाओं के आयोजन का आह्वान भी किया गया है।
यूनियनों के अनुसार केंद्र ने एक तरह से बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई के समय में यह समूचे श्रमिक वर्ग के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया है और केंद्र सरकार अपने पूंजीपति दोस्तों के साथ मिलकर देश को फिर से “मालिक-नौकर” के शोषणकारी युग में धकेलने का प्रयास कर रही है, जिसका श्रमिक वर्ग को विरोध करना होगा।

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