जैविक कचरा जलाने से बढ़ रहा वायु प्रदूषण, सांस के मरीजों में इजाफा; डॉ. सेनिराय ने जैविक खाद बनाने की उठाई मांग
देहरादून। हरी-भरी वादियों के लिए मशहूर देहरादून इन दिनों खुले में पत्तियों और प्लास्टिक कचरे को जलाने से उत्पन्न हो रहे जहरीले धुएं की चपेट में है। इस गंभीर पर्यावरणीय संकट को लेकर भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अतिरिक्त निदेशक डॉ. अश्विनी कुमार सेनिराय ने पत्र के माध्यम से प्रशासन और नागरिकों का ध्यान आकर्षित किया है।
डॉ. सेनिराय के अनुसार, शहर में बड़ी संख्या में पेड़ों से गिरने वाली सूखी पत्तियों को नगर निगम की ओर से ठीक से एकत्रित नहीं किया जाता, जिससे आम लोग मजबूरन इन्हें और साथ ही प्लास्टिक कचरे को खुले में आग लगाकर निपटाने को विवश हैं। लेकिन इस छोटी सी सुविधा की कमी का बड़ा परिणाम सामने आ रहा है—वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है और बच्चों तथा बुजुर्गों में अस्थमा व अन्य सांस रोगों के मामले बढ़ गए हैं।
डॉ. सेनिराय ने इसका ठोस और व्यावहारिक समाधान भी सुझाया है। उनका कहना है कि नगर निगम को गिरी हुई पत्तियों और घरेलू जैविक कचरे को अलग से एकत्रित कर उसे जैविक खाद (कम्पोस्ट) में बदलने की व्यवस्था करनी चाहिए। इससे जहां जलाने की घटनाएं रुकेंगी, वहीं कचरा एक उपयोगी संसाधन में तब्दील होगा। साथ ही, प्लास्टिक के स्थान पर कागज के थैलों जैसे जैव-अवक्रमणीय विकल्पों को अपनाने पर भी जोर दिया गया है।
वरिष्ठ अधिकारी ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया गया, तो देहरादून का प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यावरण दोनों ही गंभीर रूप से प्रभावित होंगे। उन्होंने संबंधित अधिकारियों से शीघ्र और प्रभावी कदम उठाने की अपील की है।
“यह केवल कचरा जलाने की समस्या नहीं है, यह एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बनती जा रही है। लंबे समय तक इस धुएं में रहना जलवायु परिवर्तन को भी गति देता है,” – डॉ. अश्विनी कुमार सेनिराय

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