जन संघर्ष मोर्चा के रघुनाथ सिंह नेगी ने पूंजीपतियों के बढ़ते दखल, 18 साल की मतदान आयु और पोलिंग बूथों पर ‘बस्तों’ पर उठाए सवाल; मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने 25 मार्च को भेजा पत्र
विकासनगर/देहरादून । लोकतंत्र की मजबूती के लिए चुनावी प्रक्रिया में व्यापक सुधार की मांग अब भारत निर्वाचन आयोग तक पहुंच गई है। जन संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष एवं जीएनवीएन के पूर्व उपाध्यक्ष रघुनाथ सिंह नेगी ने कुछ दिन पहले मुख्य निर्वाचन अधिकारी, उत्तराखंड श्री वी.बी.आर.सी. पुरुषोत्तम से मुलाकात कर मुख्य चुनाव आयुक्त को ज्ञापन सौंपा था। इसी कड़ी में 25 मार्च, 2026 को मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया को पत्र प्रेषित कर दिया।
नेगी ने सवाल उठाते हुए कहा, “यदि गरीब जनप्रतिनिधि नहीं बनेंगे तो गरीबों की कौन सुनेगा?” उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले कुछ वर्षों में लोकसभा, विधानसभा और अन्य चुनावों में पूंजीपतियों का दखल तेजी से बढ़ा है। पैसे के दम पर जनप्रतिनिधि बनने की होड़ ने गरीबों और समाज की अंतिम पंक्ति में बैठे व्यक्ति को न्याय से वंचित कर दिया है। उनके अनुसार इससे लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं ध्वस्त हो रही हैं।
नेगी ने कहा कि मतदान के दौरान पोलिंग स्टेशनों के बाहर लगने वाले स्टॉल (बस्तों) पर तत्काल रोक लगनी चाहिए। तर्क दिया कि सरकार हर बूथ पर बीएलओ तैनात करती है और वोटर स्लिप घर-घर पहुंच जाती है, ऐसे में इन स्टॉलों की कोई आवश्यकता नहीं है।
सबसे दिलचस्प मांग यह रखी गई कि मतदाता की उम्र फिर से 21 वर्ष की जानी चाहिए। नेगी ने कहा, “18 साल के टीनएजर्स को प्रत्याशी हर तरह के नशे परोसकर बर्बाद कर रहे हैं, जिससे समाज में नशा करने वालों की तादाद बढ़ रही है।” हालांकि उन्होंने यह भी माना कि 18 साल का युवा आईटी और विज्ञान जैसे क्षेत्रों में झंडा तो गाड़ सकता है, लेकिन जनसरोकार और सामाजिकता की बारीकियों को समझने में दशकों लग जाते हैं।
नेगी ने कहा कि 18 साल मतदान की उम्र होने से एक तरह से ‘अपरिपक्व लोकतंत्र’ स्थापित हो रहा है, जहां एक किशोर अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जैसे पदों का चुनाव कर रहा है। उन्होंने चुनावी रैलियों में मोटरसाइकिल-स्कूटरों के अंधाधुंध इस्तेमाल पर भी चिंता जताई, जो युवाओं को बर्बाद कर रहा है।
नेगी का कहना था कि पूंजीपति चुनाव में इसलिए आते हैं क्योंकि उनका उद्देश्य सिर्फ लगाई गई रकम को कई गुना बढ़ाना होता है। इसका परिणाम यह है कि गरीब और मध्यम वर्गीय जनता को इंसाफ नहीं मिल पाता। उन्होंने समय रहते लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए चुनावी प्रक्रिया में गुणात्मक सुधार की अनिवार्यता बताई।
अब देखना यह होगा कि भारत निर्वाचन आयोग इस पत्र पर क्या कार्रवाई करता है। चुनाव सुधारों को लेकर छिड़ी यह बहस आगामी चुनावों के मद्देनजर और तेज हो सकती है।


Recent Comments