

श्रीनगर गढ़वाल । हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, बिड़ला परिसर की ओर से भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘डिजिटल युग में उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और पॉप कल्चर’ का मंगलवार को समापन हुआ। संगोष्ठी के दूसरे दिन लोकसंस्कृति के संरक्षण, संवर्धन, नवाचार और वैश्विक प्रसार को लेकर गंभीर विमर्श हुआ। लोककलाकारों की प्रस्तुतियों और शोधार्थियों के शोध-पत्र वाचन ने कार्यक्रम को जीवंत बना दिया।
दूसरे दिन के अकादमिक सत्र की अध्यक्षता एमएमटीसी के निदेशक प्रो. डी. एस. नेगी ने की। इस दौरान युवा लोककलाकार अरविंद चौहान और अनुराग नौटियाल को उत्तराखंड की लोकसंस्कृति के प्रचार-प्रसार में योगदान के लिए प्रतीक चिह्न एवं प्रशस्ति-पत्र देकर सम्मानित किया गया। अरविंद चौहान ने गीतों के माध्यम से पारंपरिक और आधुनिक संगीत के समन्वय को लोकसंस्कृति के संरक्षण के लिए आवश्यक बताया। उन्होंने जीतू बगड़वाल की लोकगाथा की प्रस्तुति के माध्यम से पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ आधुनिक वाद्ययंत्रों के समावेश को डिजिटल दौर की महत्वपूर्ण विशेषता बताया। अनुराग नौटियाल ने पारंपरिक मांगल गीत प्रस्तुत करते हुए कहा कि डिजिटल माध्यमों ने लोककलाकारों और प्रतिभाशाली युवाओं को अपनी कला व्यापक स्तर पर प्रस्तुत करने के नए अवसर दिए हैं।
मुख्य अतिथि डॉ. अजय कुमार सिंह ने कहा कि लोकसंस्कृति को रूढ़ियों में बांधने के बजाय उसमें प्रवाहशीलता और परिवर्तनशीलता बनाए रखना जरूरी है। डिजिटल युग ने उत्तराखंड की लोकसंस्कृति को राष्ट्रीय और वैश्विक मंच तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण अवसर दिया है। उन्होंने लोकसंस्कृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित करने पर भी जोर दिया। इसके बाद विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए शोधार्थियों ने 15 शोध-पत्रों का वाचन किया।

समापन सत्र की अध्यक्षता अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो. ओ. पी. गुसाईं ने की। कुलसचिव प्रो. वाई. पी. रेवानी मुख्य अतिथि और उप-निदेशक प्रो. राजेंद्र सिंह नेगी विशिष्ट अतिथि रहे। लोकगायिका अंजली खरे और लोकगायक सचिन पुसौला ने अपनी प्रस्तुतियों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। प्रो. वाई. पी. रेवानी ने लोकसंस्कृति के दस्तावेजीकरण और डिजिटल अभिलेखीकरण पर जोर दिया। प्रो. ओ. पी. गुसाईं ने कहा कि युवाओं को अपनी भाषा, लोकगीत, लोकगाथाओं और परंपराओं से जोड़ना समय की आवश्यकता है। प्रो. राजेंद्र सिंह नेगी ने लोककलाओं को उनकी प्रामाणिकता के साथ डिजिटल माध्यमों पर प्रस्तुत करने की जरूरत बताई।
सत्र का संचालन डॉ. अनूप सेमवाल ने किया। समापन अवसर पर हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. मंजुला राणा ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, शोधार्थियों एवं श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। संगोष्ठी के संयोजक डॉ. कपिल देव पंवार ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, शोधार्थियों, आयोजन समिति के सदस्यों, विश्वविद्यालय के अधिकारियों, शिक्षकों, कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों के सहयोग के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने कहा कि सभी की सहभागिता से संगोष्ठी अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल रही। उन्होंने भविष्य में भी लोकसंस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए ऐसे अकादमिक प्रयास जारी रखने पर जोर देते हुए दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के औपचारिक समापन की घोषणा की।

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