उत्तराखंड में एनपीएस के विरोध में 1 अक्टूबर 2025 को राष्ट्रीय पुरानी पेंशन बहाली संयुक्त मोर्चा ने पौड़ी में काला दिवस मनाते हुए मसाल जुलूस निकाला; प्रदेश सरकार को अंतिम चेतावनी — विरोध आगे न बढ़ा तो आंदोलन संसद दरवाज़ों तक जाएगा।
पौड़ी/देहरादून। राष्ट्रीय पुरानी पेंशन बहाली संयुक्त मोर्चा के आह्वान पर उत्तराखंड में 1 अक्टूबर 2025 को कर्मचारी और शिक्षक संगठनों ने काला दिवस मनाया और जनपद मुख्यालय पौड़ी में विशाल मसाल जुलूस निकाला। विरोध प्रदर्शन में शामिल नेताओं का कहना था कि केंद्र और प्रदेश सरकार एनपीएस (NPS) व यूपीएस के माध्यम से कर्मचारियों के साथ धोखा कर रही है और यदि शीघ्र ही पुरानी पेंशन बहाल नहीं की गई तो यह छोटी-सी चिंगारी बड़ी आग बनकर पूरी व्यवस्था को झकझोर देगी।
प्रदेश अध्यक्ष जयदीप रावत ने समर्थकों को सम्बोधित करते हुए कहा कि “अब कर्मचारी पुरानी पेंशन से कम पर राज़ी नहीं हैं। हमारी माँग स्पष्ट है — पुरानी पेंशन बहाल कीजिए वरना यह आंदोलन और तेज होगा।” उन्होंने सरकार को चेतावनी दी कि यह केवल कर्मचारी वर्ग की लड़ाई नहीं रह जाएगी, बल्कि यह पूरे समाज के भविष्य की सुरक्षा का प्रश्न बन चुका है।
प्रदेश महासचिव सीताराम पोखरियाल ने बताया कि नई पेंशन व्यवस्था के तहत सेवानिवृत्त कर्मचारियों को मात्र 1,000 से 2,000 रुपये जैसी नाममात्र की राशि मिल रही है, जिसके कारण उनका बुढ़ापा आर्थिक रूप से असहाय बन चुका है। “किस तरह से कोई सम्मानपूर्वक जीवन काटे?” उन्होंने प्रश्न उठाया और कहा कि यह व्यवस्था निर्धारित सामाजिक सुरक्षा के सिद्धांतों के खिलाफ है।

जनपद अध्यक्ष भवान सिंह ने तंज कसा कि एक दिन का विधायक या सांसद भी पुरानी पेंशन ले रहा है और बार-बार चुने जाने पर प्रत्येक बार उसे पुरानी पेंशन का लाभ मिलता है, जबकि कर्मठ कर्मचारी वर्षों सेवा देने के बाद न्यूनतम सहायता पाने में भी असमर्थ हैं।
गढ़वाल मंडल की महिला प्रभारी रनिता प्रसाद विश्वकर्मा ने कहा कि आज का मशाल जुलूस केवल कर्मचारियों का आक्रोश नहीं है, बल्कि हर मेहनतकश व्यक्ति के सुरक्षित भविष्य का संकेत है। उन्होंने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा — “यदि पुरानी पेंशन बहाल नहीं हुई तो यह सिर्फ एक वर्ग का नुकसान नहीं रहेगा; सम्पूर्ण समाज असुरक्षा के दलदल में फँस जाएगा।”
मोर्चा ने स्पष्ट शब्दों में संकेत दिया कि अब वे केवल मांग पत्र भेजने तक सीमित नहीं रहेंगे। आज के मशाल जुलूस में उपस्थित प्रमुख कार्यकर्ता और सदस्यों में निर्मला राणा, रघुराज सिंह चौहान, दीपक गोडियाल, प्राची, अंकित बागवानी, संजीव, विकास रावत, प्रभा खर्कवाल, नीलम नेगी, पूजा नेगी, संगीता असवाल, रेनू, विजयलक्ष्मी, त्रिलोक नेगी, जे. ओ. एस. ओ. रावत, रश्मि, मंजू, चंद्रिका, मीनाक्षी रावत, मंजूलता, मंजू असवाल, रिंकी हिमानी, सुशील कुमार, अंकित कठैत, संदीप भट्ट, कुलदीप रावत आदि शामिल थे।
नेताओं ने कहा कि 2005 से पहले नियुक्त कर्मचारियों को पुरानी पेंशन मिलती रही, परंतु 1 अक्टूबर 2005 से लागू एनपीएस ने पेंशन सुरक्षा को कमजोर कर दिया। मोर्चा का आरोप है कि जब कर्मचारियों से एनपीएस/यूपीएस का विकल्प मांगा गया तो अधिकांश ने किसी विकल्प को स्वीकार करने से पहलकदमी से इंकार कर दिया — यह स्पष्ट संकेत है कि कर्मचारी पुरानी पेंशन चाहते हैं।

आंदोलन की अगली रणनीति को लेकर मोर्चा ने संकेत दिया कि यदि उनकी मांगों पर ठोस कदम न उठाए गए तो वे ‘राष्ट्रीय पेंशन सत्याग्रह’ की शुरुआत करेंगे — एक शांतिपूर्ण परन्तु निर्णायक आन्दोलन जिसमें करोड़ों कर्मचारी, परिवार और समाज मिलकर भाग लेंगे। मोर्चा ने इसे “पहली और अंतिम चेतावनी” करार दिया और कहा कि संघर्ष जल्द ही प्रशासनिक गलियारों से निकलकर संसद के दरवाज़ों तक पहुँचेगा।
स्थानीय नागरिकों ने भी जुलूस में भाग लेकर समर्थन जताया और कहा कि पेंशन केवल सरकारी कर्मचारियों का मुद्दा नहीं है — यह जीवन स्तर, सामाजिक सम्मान और वृद्धावस्था की सुरक्षा का प्रश्न है।
मोर्चा ने प्रदेश सरकार और संबंधित केंद्र शासित निकायों को तीन सप्ताह का समय दिया है। यदि इस अवधि में पुरानी पेंशन बहाली के स्पष्ट रोडमैप की घोषणा नहीं होती है तो मोर्चा धीरे-धीरे अपना आंदोलन तीव्र करने की बात कर चुका है।

Recent Comments