विवादों में घिरे अपर सचिव अरुणेंद्र सिंह चौहान: थप्पड़, भ्रष्टाचार और कोर्ट की जांच—शासन की चुप्पी पर उठे सवाल

देहरादून,18अप्रैल 2025। उत्तराखंड शासन में अपर सचिव (वित्त) अरुणेंद्र सिंह चौहान एक बार फिर विवादों के केंद्र में हैं। हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में उन्हें देहरादून के सुद्धोवाला क्षेत्र में एक व्यक्ति पर थप्पड़ मारने की कोशिश करते हुए देखा गया। हालांकि संबंधित व्यक्ति ने चौहान का हाथ समय रहते पकड़ लिया, लेकिन यह पूरी घटना प्रशासनिक गरिमा पर बड़ा सवाल खड़ा करती है।

मामला यहीं नहीं रुका। स्थानीय पुलिस जब विवाद की जानकारी मिलने पर मौके पर पहुंची, तो दरोगा हर्ष अरोड़ा ने चौहान से उनके व्यवहार पर सवाल उठाया कि ऐसे उच्च पद पर रहते हुए इस प्रकार की हरकत शोभा नहीं देती। मगर इस बहस ने ऐसा मोड़ लिया कि चौहान ने मुख्य सचिव, डीजीपी और वित्त सचिव को शिकायत भेज दी। नतीजा यह हुआ कि ईमानदारी से अपनी ड्यूटी निभा रहे दरोगा हर्ष अरोड़ा को ‘लाइन हाजिर’ कर दिया गया, जिसे पुलिस महकमे में एक तरह की सजा माना जाता है।

यह पूरा विवाद पंडित दीनदयाल उपाध्याय वित्तीय प्रशासन, प्रशिक्षण एवं अनुसंधान केंद्र (PDUTFRA), सुद्धोवाला की भूमि से जुड़ा है। आरोप है कि संस्थान की तारबाड़ काट दी गई और निर्माणाधीन दीवार गिरा दी गई। दूसरी ओर, स्थानीय लोगों का कहना है कि यह दीवार उनके निजी रास्ते को अवरुद्ध कर रही थी, जिससे तनाव उत्पन्न हुआ।

लेकिन यह कोई पहला मामला नहीं है जहां चौहान पर गंभीर आरोप लगे हों। उन पर पहले से ही 100 करोड़ रुपये से अधिक की अघोषित संपत्ति अर्जित करने के आरोप हैं। वर्ष 2022 में RTI कार्यकर्ता सीमा भट्ट ने इस मामले में राष्ट्रपति और सीबीआई को शिकायत भेजी थी, जिसके बाद सीबीआई ने राज्य सरकार से जांच की अनुमति मांगी थी। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि अब तक सरकार ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की, मानो यह मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया हो।

इस बीच एक और बड़ा झटका चौहान के लिए तब आया जब मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सैय्यद गुफरान की अदालत ने 16 अप्रैल को एक नए मामले की जांच के आदेश दिए। यह मामला श्री श्री 1008 नारायण स्वामी चैरिटेबल ट्रस्ट की जमीन से जुड़ा है। ट्रस्टी मनीष वर्मा द्वारा दायर शिकायत में चौहान समेत अन्य अधिकारियों के नाम शामिल हैं। अदालत ने मामले की प्राथमिक जांच शुरू करने के निर्देश दिए हैं।

इन तमाम घटनाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है:
क्या उत्तराखंड सरकार चौहान को बचा रही है?
क्यों अब तक कोई निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच नहीं हो पाई?
क्या एक अफसर के पद, प्रभाव और संपर्क कानून से ऊपर हो सकते हैं?

प्रदेश में प्रशासन की जवाबदेही और पारदर्शिता की बात करने वाली सरकार की चुप्पी अब संदेह के घेरे में है। जब एक पुलिस अधिकारी को मात्र सवाल उठाने पर दंडित कर दिया जाता है, और करोड़ों की संपत्ति के आरोपों पर भी जांच शुरू नहीं होती—तो आम जनता किससे न्याय की उम्मीद करे?

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