गैर-सनातनी श्रद्धालुओं को देना होगा आस्था का हलफनामा; 45 अन्य मंदिरों में भी लागू होगी व्यवस्था
देहरादून। उत्तराखंड की पवित्र चारधाम यात्रा के शुभारंभ से पूर्व बदरी-केदार मंदिर समिति (बीकेटीसी) ने एक ऐतिहासिक और चर्चित निर्णय लेते हुए मंदिरों की धार्मिक मर्यादा को सुरक्षित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने स्पष्ट किया है कि बदरीनाथ, केदारनाथ सहित समिति के अधीनस्थ 45 अन्य मंदिरों में अब गैर-सनातनी धर्मावलंबियों के प्रवेश के लिए कड़ी शर्त लागू की जाएगी।
नए नियम के अनुसार, केदारनाथ और बदरीनाथ धाम के दर्शन के इच्छुक ऐसे व्यक्ति जो सनातन या हिंदू धर्म से संबद्ध नहीं हैं, उन्हें अनिवार्य रूप से ‘आस्था का शपथ-पत्र’ प्रस्तुत करना होगा। इस हलफनामे के माध्यम से श्रद्धालु को यह घोषित करना होगा कि उनकी सनातन धर्म और उसकी परंपराओं में अटूट आस्था है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए यह शपथ-पत्र मंदिर परिसर में ही उपलब्ध कराया जाएगा, ताकि किसी भी सच्चे भक्त को दर्शन से वंचित न होना पड़े।
बीकेटीसी अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने इस नए नियम को समझाते हुए बॉलीवुड अभिनेत्री सारा अली खान का उदाहरण दिया, जो अक्सर केदारनाथ धाम में पूरी श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना करने पहुंचती हैं। श्री द्विवेदी ने कहा, “हमारा निर्णय किसी विशेष समुदाय या व्यक्ति को लक्षित करके नहीं लिया गया है। यदि सारा अली खान जैसी कोई हस्ती भी केदारनाथ आती हैं और वे सनातन धर्म के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हुए शपथ-पत्र प्रस्तुत करती हैं, तो उनके दर्शनों में कोई बाधा नहीं होगी। हमारा उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि मंदिर में प्रवेश करने वाला प्रत्येक व्यक्ति यहां की मान्यताओं और परंपराओं का सम्मान करता हो।”
मंदिर समिति द्वारा यह निर्णय कई कारणों से लिया गया है:
· धार्मिक मर्यादा की रक्षा: समिति के अनुसार, तीर्थस्थलों की पवित्रता और धार्मिक परंपराओं को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए यह कदम आवश्यक था।
· बढ़ती अनुशासनहीनता: हाल के वर्षों में मंदिर परिसरों में रील बनाने और धार्मिक मर्यादाओं के उल्लंघन की शिकायतों के मद्देनजर समिति ने बोर्ड बैठक में यह निर्णय सर्वसम्मति से लिया।
· पारदर्शिता और सम्मान: शपथ-पत्र के माध्यम से समिति यह सुनिश्चित करना चाहती है कि मंदिर की चौखट में प्रवेश करने वाला प्रत्येक व्यक्ति यहां की आस्था और परंपराओं का पूर्ण सम्मान करता है।
यह फैसला आगामी यात्रा सीजन में काफी चर्चा का विषय बना रहेगा। जहां एक ओर धार्मिक संगठनों और संत समाज ने इसका स्वागत किया है, वहीं दूसरी ओर कुछ वर्ग इसे पर्यटन उद्योग और समावेशी संस्कृति के दृष्टिकोण से चुनौतीपूर्ण मान रहे हैं। फिलहाल प्रशासन और मंदिर समिति इस नई व्यवस्था को धरातल पर उतारने की तैयारियों में जुट गई है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह नियम कितने प्रभावी ढंग से लागू होता है और श्रद्धालुओं की क्या प्रतिक्रिया रहती है।

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