नई दिल्ली, 27 फरवरी। एयरलाइन पायलट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एएलपीए इंडिया) ने भारतीय एयरलाइन्स की अत्यधिक प्रशिक्षण फीस पर गंभीर चिंता जताई है. एएलपीए इंडिया कहा कि यह महत्वाकांक्षी पायलटों का शोषण है. विमानन क्षेत्र में प्रशिक्षित कर्मियों की निरंतर कमी का एक कारण है. नागरिक विमानन मंत्री को लिखे एक पत्र में एएलपीए इंडिया ने प्रशिक्षु पायलटों पर लगाए गए वित्तीय बोझ को अनैतिक मुनाफाखोरी बताया है, जिससे मध्यम वर्गीय परिवार के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों का लाभ उठाना मुश्किल होता जा रहा है.
डीजीसीए के अनुसार, 2024 में 1,342 वाणिज्यिक पायलट लाइसेंस (सीपीएल) जारी किए गए, जो 2023 में 1,622 के पिछले रिकॉर्ड से 17 प्रतिशत कम है. विमानन विशेषज्ञ हर्षवर्धन ने इस गिरावट के लिए एयरलाइन के पतन और सीमित नए लोगों को शामिल करने को जिम्मेदार ठहराया, उन्होंने कहा कि साल दर साल कोई पूर्ण संबंध नहीं है, क्योंकि एयरलाइंस भविष्य के विस्तार के आधार पर भर्ती की योजना बनाती हैं. जब कोई नया बेड़ा नहीं निकलता है, तो भर्ती धीमी हो जाती है. उन्होंने जोर देकर कहा कि नौकरी की उपलब्धता और बाजार की मांग पायलट लाइसेंस संख्या में उतार-चढ़ाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
एएलपीए ने कहा कि भारतीय एयरलाइंस ने अपने एकाधिकार नियंत्रण और कार्टेलाइज्ड योजनाओं के साथ कैडेट पायलटों को उनके अधिकारों से वंचित करने की कोशिश की है. एएलपीए इंडिया के अध्यक्ष सैम थॉमस ने कहा कि एयरलाइंस ने कार्टेल बना लिया है. वे विमान ऑर्डर करने पर मिलने वाले मुफ्त प्रशिक्षण क्रेडिट से लाभ कमाना चाहते हैं. पहले, एक ऐसी व्यवस्था थी, जिसमें एयरलाइंस पायलटों को प्रशिक्षित करती थीं और प्रशिक्षण बांड निष्पादित करती थीं.
हालांकि, एयरलाइन प्रशिक्षण विभागों ने बेईमान मानव संसाधन प्रभागों के साथ मिलकर इस प्रशिक्षण को अत्यधिक कीमतों पर बेचना शुरू कर दिया, जिससे पायलट कर्ज और बंधुआ मजदूरी के चक्र में फंस गए. उन्होंने आगे कहा कि भारत में वाणिज्यिक पायलट लाइसेंस प्राप्त करने में 30-35 लाख रुपये का खर्च आता है, जबकि विशिष्ट विमानों के लिए टाइप रेटिंग के लिए ऊपरी छोर पर 10-15 लाख रुपये से अधिक शुल्क नहीं लिया जाना चाहिए.
एयरलाइन पायलट्स एसोसिएशन ने भारतीय एयरलाइन्स की अत्यधिक प्रशिक्षण फीस पर चिंता जताई
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