भारत चीन संबंधों का नया दौर का एक विश्लेषण

अजय दीक्षित
1962 की कड़वाहट को 63 वर्ष बाद भारत और चीन नए सिरे से लिखने की भूमिका बना रहे हैं। इसी सिलसिले में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज चीन पहुंचे हैं इससे पहले विदेश मंत्री एस जयशंकर और रक्षा सलाहकार अजीत डोभाल अभी हाल में चीन में थे । यह घटनाक्रम यू एस प्रेसिडेंट डॉनल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर लगाए जा रहे पचास फीसदी टैरिफ से शुरू हुआ है।इसी दौर में ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल मुनीर खान को वाशिंगटन बुलाया गया था और उनके साथ ट्रंप ने डिनर कर यह संकेत दिया था कि पाकिस्तान उसके लिए महत्वपूर्ण है।
हालांकि भारत के साथ ट्रंप की नीति क्यों बदली इसको लेकर कई धारणाएं हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने डोनॉल्ड ट्रंप को नोबेल पुरस्कार देने की सहमति देने से इनकार कर दिया था जबकि व्हाइट हाउस की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तीन बार संपर्क किया गया था। पाकिस्तान ने इस बात को प्राथमिकता दी और सार्वजनिक रूप से सहमति दी। हालांकि कूटनीतिक क्षेत्र में यह बात समझ में नहीं आती है लेकिन और भी बहुत से कारण हैं।
दरअसल न्यूयॉर्क टाइम्स में जो आज रिपोर्ट प्रकाशित हुई है उसमें कहा गया है कि यूक्रेन रूस युद्ध समाप्त नहीं होने के पीछे भारत है जो रूस से लगातार सस्ती दरों के नाम पर क्रूड ऑयल,गैस खरीद रहा है और रूस को उसी धन से मदद कर रहा है। अमेरिकन पेंटागन अधिकारियों ने बकायदा पत्र लिख कर यू एस प्रेसिडेंट डॉनल्ड ट्रंप को कहा है कि रूस यूक्रेन पर कब्जा कर ही दम लेगा। उल्लेखनीय है कि भारत अपनी खपत का चालीस फीसदी क्रूड ऑयल रूस, से खरीद रहा है।वह भी विश्व बाजार से 30 फीसदी तक सस्ता है और कारोबार रुपए में है। यू एस प्रेसिडेंट डॉनल्ड ट्रंप कई बार युद्ध समाप्त करने का प्रयास कर चुके हैं लेकिन पुतिन नहीं मान रहे हैं। हालांकि चाइना भी ऐसा ही कर रहा है।
 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डॉनल्ड ट्रंप की नीति से निपटने के लिए अब चीन की ओर रुख किया है। भारत पहले से ही बहुत सी कच्चा मॉल चीन से खरीदता है। जिसमें दवाइयों का रो मटेरियल, शामिल है। रूसी विचारक, कहानीकार, कवि, टॉलस्टाय ने कहा था कि दो लोगों के संबंध हो सकते हैं लेकिन दो राष्ट्रों के संबंध बिल्कुल व्यवसायिक होते हैं।
चाइना पाकिस्तान या भारत अमेरिका के संबंध एक दूसरे के हितों पर आधारित होते हैं।
चाइना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सबसे पहले गलवान घाटी, अरुणाचल प्रदेश में सीमा विवाद जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देना चाहेंगे।1962 में जवाहर लाल नेहरू को चीन से धोखा मिला था। उनकी विदेश नीति मटियामेट हो गई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फूंक फूंक कर कदम रखेंगे। व्यापार के मुद्दे पर भारत और चीन दोनों को आसानी होगी। पाकिस्तान भी एक मसला होगा क्योंकि ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान चाइना के हथियारों से लड़ा था।

( लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)

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