​संतुलन की कला सिखाती शरद ऋतु।

ऋतुओं के बीच छुपम-छुपाई का खेल हो, तो ताज शरद ऋतु के सिर ही सजेगा। बिना आहट के पीछे से आकर धप्पा मारने में कोई नहीं पछाड़ सकते इसे। गर्मी और सर्दी के बीच में चुपके से आ बैठ जाती है यह ऋतु – जब मॉनसून के बादल घर लौटने की तैयारी कर रहे होते हैं, धूप धीरे-धीरे नरम पड़ने लगती है और शाम ठंडी, जब सूरज अपनी रोशनी अगली गर्मियों के लिए बचाने लगता और रातें पैर फैलाने लगती हैं। इन दिनों में मौसम के साथ मन भी बदल जाता है – लगातार आने वाले पर्वों के उत्साह से सराबोर।

शरद ऋतु ट्रांजिशन पीरियड है – एक मौसम से दूसरे मौसम का बदलाव, गर्मियों से सर्दियों की यात्रा। प्रकृति अपने पन्ने बदलती है, जैसे जीवन में नया अध्याय जुड़ना। बीच का यह समय ज्यादा संवेदनशील बनाता है और ठहरना सिखाता है। पसीने की लकीरें गर्मियों का ऐलान कर देती हैं और हाथों का सर्द होना बताता है कि ठंड आ चुकी है, लेकिन शरद के आगमन को जानने के लिए उसे महसूस करना होता है।

इस ट्रांजिशन में गहरा आनंद है – यह हमें अस्थिरता में स्थिरता ढूंढना सिखाता है। बताता है कि परिवर्तन डरने की चीज नहीं, स्वाभाविक हिस्सा है जीवन का। कुछ भी हमेशा के लिए नहीं टिकता – सूरज का ताप भी नहीं। समय का चक्र हमेशा चलता रहता है और असली कमाल है उसके साथ सामंजस्य बैठाने में। यह उम्मीद कभी नहीं छोड़नी चाहिए कि बदलाव अच्छे के लिए ही होगा।

शरद ऋतु को पतझड़ भी कहते हैं, जब पेड़-पौधे पुरानी पत्तियों को छोड़ने लगते हैं। शाखों से गिरते पत्ते याद दिला रहे कि छोड़ना भी जरूरी है। जब पुराना जाएगा, तभी नया आएगा। कुछ आदतों, कुछ सोच को भी ऐसे ही छोड़ने की जरूरत पड़ती है ताकि नई उम्मीदों और नई सोच के लिए जगह बन सके। और जाना हमेशा नकारात्मक ही नहीं होता। वह विदाई बहुत भव्य होती है, जब कोई अपनी भूमिका निभाकर और अपनी विरासत को मजबूत हाथों में सौंप कर जा रहा हो।

यह मौसम है संतुलन का – ऐसा समय जब न धूप परेशान करती है, न ठंड काटती है और हवा की सहजता आसान कर देती है सफर। ऐसा ही बैलेंस चाहिए जीवन में, जहां रफ्तार उतनी ही हो, जिससे रिश्ते-नाते पीछे न छूट जाएं, लेकिन ऐसा ठहराव भी न आए कि बाकियों से हम पीछे रह जाएं। शरद ऋतु सिखाती है कि दोनों के बीच एक जगह है जहां कदम भी बढ़ते हैं और सांसें भी संतुलित रहती हैं। जहां सपने और संबंध, दोनों साथ रहते हैं। दो ताकतवर ऋतुओं के बीच भी खुद को बचाए हुए है शरद। वह कभी कोशिश नहीं करती गर्मी या सर्दी बन जाने की। ऐसा ही भरोसा तो चाहिए जीवन में।

साभार : शैलेंद्र पांडेय

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