चरित्र ही जीवन का आधार है: एक आध्यात्मिक पड़ताल

कहते हैं कि धन गया तो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य गया तो कुछ गया और अगर चरित्र चला गया तो सब कुछ चला गया। तभी तो समस्त विश्व में लोग अपने-अपने घरों में सर्वगुण सम्पन्न एवं चरित्रवान देवी-देवताओं के चित्र लगाते हैं, ताकि उनके चित्रों को देखकर वे स्वयं के चरित्र का निर्माण कर सकें। हमारे विद्वान ऋषि-मुनि यह कहकर गए हैं कि कोई देश आॢथक दृष्टि से भले ही गरीब क्यों न हो, परंतु यदि उसमें वास करने वाले मनुष्यों के पास चरित्र रूपी धन है तो उस देश को एक महान राष्ट्र बनने से कोई रोक नहीं सकता। तभी तो कहा गया है कि चरित्र एक ऐसा कीमती हीरा है, जिसके सामने संसार के समस्त खजाने बेकार हैं। जिस परिवार में एक चरित्रवान व्यक्ति की मौजूदगी होती है, वह परिवार कभी भी टूटता-बिखरता नहीं, क्योंकि उस एक व्यक्ति की श्रेष्ठ चलन से समस्त परिवार को सच्चरित्रता का गुण धारण करने की प्रेरणा मिलती रहती है। यदि किसी व्यक्ति को बाह्य सुंदरता प्राप्त होती हैं, परंतु उसमें आंतरिक या यूं कहें कि उच्च चरित्र रूपी सुंदरता का अभाव हो, तो उसका व्यक्तित्व कदापि आकर्षक नहीं होगा।तभी तो कहा गया है कि व्यक्ति की वास्तविक सुंदरता उसके गुणों से प्रतीत होती है, न कि बनावटी बाह्य दिखावे से।

इसीलिए जब भी हम देवताओं के सुंदर चित्रों को देखते हैं तो न चाहते हुए भी उनके विविध चरित्र हमारे सामने आ ही जाते हैं। यही कारण है कि पूजा सदैव देवताओं की ही होती है, मनुष्यों की नहीं, क्योंकि जो चरित्रवान हैं वही पूजा के योग्य हैं। अत: किसी का चित्र भले ही कितना भी सुंदर क्यों न हो लेकिन चरित्र के अभाव में वह पूजनीय कभी हो नहीं सकता। सौंदर्य प्रतियोगिता में भले ही किसी कन्या को विश्व सुंदरी की उपाधि दे दी जाए लेकिन आकर्षणमूर्त होते हुए भी न तो उसकी पूजा हो सकती है और न ही उसका मंदिर बन सकता है।

वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हम ‘चारित्रिक पतन’ की चरम सीमा की और बड़ी तेजी के साथ दौड़े जा रहे हैं। जी हां! नि:संदेह आज जहां देखो वहां आधुनिकीकरण के नाम पर चारित्रिक पतन के नए-नए रिकार्ड मनुष्य बनाता जा रहा है। यह सुनने में बड़ा शर्मनाक लगता है, परंतु यही हमारे बदसूरत वर्तमान की सच्चाई है। फैशन रूपी रोग ने मनुष्यों को सर्व प्रकार की मर्यादाएं भुलाकर सतत् दैहिक क्रीड़ा करने को प्रेरित कर दिया है। एक तरफ कामवासना की बढ़ती हुई आंधी ने मनुष्य के मन को विकृत करके बेचैन और अशांत कर दिया है, तो दूसरी तरफ क्रोध व अहंकार ने विद्वानों की बुद्धि पर अज्ञान रूपी काला पर्दा डाल दिया है। सुशिक्षित वर्ग के लोगों ने चरित्र को एक प्राचीन परम्परा मानकर, उसकी भेंट में पश्चिमी संस्कृति को अपनाना अधिक फायदेमंद समझा है।

नतीजन आज की तारीख में हमारे समाज में चरित्र का जो अभाव दिख रहा है, वैसा पहले कभी भी देखने में नहीं आया, क्योंकि आज गर्भपात जैसे गंभीर विषय को भी युवा वर्ग ने बिल्कुल सामान्य रूप दे दिया है। इससे नीचे और कितनी चरित्रहीनता हमें देखनी होगी, यह तो खुद हमें ही तय करना होगा। अत: यदि हम उन देवी-देवताओं जैसा बनना चाहते हैं तो हमें हू-ब-हू उनके जैसा चरित्र बनाना होगा क्योंकि जब चरित्र सुंदर होगा तो चित्र (शरीर) भी सुंदर मिलेगा ही। तो आओ, अपने उच्च चरित्र के निर्माण के लिए पांच विकार रूपी गंदगी को परमात्मा की याद रूपी दिव्य किरणों से भस्म कर अपने चरित्र के इत्र से चारों और सद्गुणों की सुवास प्रवाहित करें और अपने श्रेष्ठ लक्ष्य की ओर आगे बढ़ें। 

डिसक्लेमर :-
इस लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सटीकता या विश्वसनीयता की गांरंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, पंचांग, मान्यताओं या फिर धर्मग्रंथों से संकलित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है। इसके सही और सिद्ध होने की प्रामाणिकता नहीं दे सकते हैं। इसके किसी भी तरह के उपयोग करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।

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