च्यवन ऋषि की कहानी के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं, जबकि उनकी कहानी आयुर्वेदिक चिकित्सा के एक महान आविष्कार से जुड़ी है, जो आज भी लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय है। वो आविष्कार है च्यवनप्राश, जिससे लोगों की इम्यूनिटी मजबूत होती है। महर्षी च्यवन ने जड़ी-बूटियों से ‘च्यवनप्राश’बनाई और उसका सेवन कर वृद्धावस्था से पुनः युवा बन गए थे। च्यवन ऋषि को ही च्यवनप्राश का जनक माना जाता है। क्या है उनकी कहानी, चलिए जानते हैं…
च्यवन ऋषि का उल्लेख ऋग्वेद, शतपथ ब्राह्मण और महाभारत में किया गया है, जहाँ उन्हें वृद्ध और कमजोर व्यक्ति के रूप में दर्शाया गया है।
महाभारत के अनुसार, च्यवन ऋषि ने इतनी कठोर तपस्या की कि उनका शरीर जर्जर हो गया और उन्हें समाधि की अवस्था में पहुँचा दिया।
च्यवन ऋषि की पत्नी सुकन्या की निष्ठा के कारण देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों ने उन्हें युवावस्था प्रदान की, जिससे उन्होंने च्यवनप्राश जैसी औषधि का निर्माण किया।
च्यवन ऋषि का वर्णन शतपथ ब्राह्मण और महाभारत में मिलता है। उपनिषदों में उन्हें भृगु वरुणी के नाम से भी जाना जाता है। च्यवन ऋषि का उल्लेख ऋग्वेद में भी किया गया है , जहाँ उन्हें एक वृद्ध और कमजोर व्यक्ति के रूप में वर्णित किया गया है, जिन्हें जवानी और ताकत जुड़वां अश्विनों द्वारा मिलती है। महाभारत के अनुसार , च्यवन ऋषि इतने शक्तिशाली थे कि वे इंद्र के दिव्य वज्र को रोकने में भी समर्थ थे। उन्होंने आयुर्वेद और रसायन शास्त्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने ही च्यवनप्राश जैसी औषधियों की परंपरा चलाई। हालांकि, इस बारे में बेहद कम लोग जानते हैं। च्यवन ऋषि की कहानी भी अपने-आप में बेहद दिलचस्प है।
च्यवन ऋषि की कहानी
च्यवन ऋषि, भृगु ऋषि के वंशज थे। महाभारत के अनुसार, जब भृगु की पत्नी पुलोमा गर्भवती थी, तो एक राक्षस ने उन्हें परेशान किया। पुलोमा का बच्चा उनके गर्भ से फिसल गया, जिसे संस्कृत में ‘च्युत’ शिशु कहा जाता है और इस प्रकार बच्चे का नाम च्यवन पड़ा । राक्षस ने बच्चे को गिरते देखकर माँ को छोड़ दिया। च्यवन ने अपने पिता से वेदों का अध्ययन किया और बाद में ब्रह्मा से वेदों का ज्ञान प्राप्त किया। बाद में वे ब्रह्मर्षि बन गए। कथा के अनुसार, एक बार उन्होंने इतनी कठोर तपस्या की थी कि उनका शरीर जर्जर हो गया और उसके ऊपर झाड़-झंखाड़ उग आए। ताप करते हुए वे वृद्धावस्था में पहुँच गए और उनका शरीर समाधि की अवस्था में। मिट्टी और झाड़ियों के कारण ऋषि का शरीर अब किसी को दिखाई नहीं देता था। उनके शरीर को देखने से कोई टीला जैसी चीज मालूम पड़ती थी। एक बार राजा शर्याती अपनी पुत्री सुकन्या और अपनी सेना के साथ वन में भ्रमण हेतु आए। वहाँ राजकुमारी ने झाड़ियों के बीच दो चमकती वस्तुएँ देखीं, जो वास्तव में च्यवन ऋषि की आँखें थीं। अज्ञानवश उसने उन आँखों को जुगनू समझकर उसपर तीर चला दिया, जिससे ऋषि की तपस्या भंग हो गई और वे क्रोधित हो उठे।च्यवन ऋषि ने क्रोधित होकर राजा की सेना को मूर्छित कर दिया। जब राजा को इसका कारण पता चला, तो उन्होंने ऋषि से क्षमा मांगी। ऋषि ने कहा कि यदि उनकी पुत्री सुकन्या उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करे, तभी वह अपनी तपस्या की शक्ति से सबको मुक्त करेंगे। सुकन्या ने सहर्ष यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। राजा ने च्यवन ऋषि से अपनी कन्या सुकन्या का विवाह करवा दिया। सुकन्या ने पति धर्म का पालन पूरी निष्ठा से किया, भले ही च्यवन वृद्ध और कमजोर थे। देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों ने जब सुकन्या की निष्ठा देखी, तो उन्होंने उससे प्रसन्न होकर च्यवन ऋषि को पुनः युवावस्था प्रदान की। इसके लिए उन्होंने ऋषि को एक विशेष औषधि दी, जिसे बाद में च्यवन ऋषि ने आयुर्वेद में लोकप्रिय बनाया और उसे “च्यवनप्राश” के नाम से जाना गया।
डिसक्लेमर :-
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