बिल्डर ने जान देकर लिखा था जिनका नाम, पुलिस को 18 महीने में उनके खिलाफ नहीं मिला एक भी सबूत
दक्षिण अफ्रीका से विवादित गुप्ता बंधुओं को मिली क्लीनचिट, 1500 करोड़ के प्रोजेक्ट और ‘साइलेंट पार्टनरशिप’ के जाल में उलझकर रह गया इंसाफ
देहरादून। क्या एक मरने वाले का आखिरी बयान (सुसाइड नोट) भी इंसाफ दिलाने के लिए काफी नहीं होता? उत्तराखंड की राजधानी के रियल एस्टेट जगत को झकझोर देने वाले सतेंद्र साहनी आत्महत्या प्रकरण का अंत कुछ ऐसे ही अनुत्तरित सवालों के साथ हुआ है। 24 मई 2024 को आठवीं मंजिल से कूदकर जान देने वाले मशहूर बिल्डर साहनी ने अपनी मौत के लिए जिन गुप्ता बंधुओं (अजय और अनिल गुप्ता) को जिम्मेदार ठहराया था, पुलिस ने 18 महीने की जांच के बाद उन्हें क्लीनचिट दे दी है। पुलिस ने अदालत में फाइनल रिपोर्ट (एफआर) दाखिल करते हुए कहा है— “आरोपियों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने के पर्याप्त सबूत नहीं मिले।”
कहानी 1500 करोड़ के सपनों और 3% की हिस्सेदारी की
इस पूरी त्रासदी की पटकथा दो महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स—सहस्रधारा रोड और राजपुर रोड (अम्मा कैफे के पास)—के साथ शुरू हुई थी। इन प्रोजेक्ट्स की कुल अनुमानित लागत 1500 करोड़ रुपये थी। सतेंद्र साहनी ने अपने पार्टनर संजय गर्ग के साथ मिलकर एक बड़ा सपना देखा था, लेकिन जेब उतनी भारी नहीं थी। प्रोजेक्ट को धरातल पर उतारने के लिए पैसे की जरूरत थी और यहीं से एंट्री हुई अनिल गुप्ता की।
साहनी ने दक्षिण अफ्रीका में विवादों में रहे गुप्ता परिवार के अनिल गुप्ता को ‘साइलेंट पार्टनर’ बनाया। डील के मुताबिक, अनिल गुप्ता को सिर्फ पैसा लगाना था और मुनाफे में हिस्सा लेना था, काम में दखलअंदाजी नहीं करनी थी। साहनी की अपनी हिस्सेदारी इसमें सिमटकर महज 3% रह गई थी, लेकिन प्रोजेक्ट का चेहरा वही थे।
जब ‘साइलेंट’ पार्टनर बना शोर का कारण
कागजों पर गुप्ता बंधु भले ही खामोश साझीदार थे, लेकिन हकीकत में उनका दखल बढ़ने लगा। अजय गुप्ता ने अपने प्रतिनिधि आदित्य कपूर को साइट पर बिठा दिया। जमीन मालिकों को जब गुप्ता बंधुओं की पुरानी पृष्ठभूमि का पता चला, तो वे बिदकने लगे। इधर, साहनी पर गुप्ता बंधु अपने निवेश (कथित तौर पर 40 करोड़, अदालती रिकॉर्ड में 19 करोड़) को लेकर दबाव बनाने लगे।
हालात ये बने कि बिल्डर साहनी के लिए आगे बढ़ना मुश्किल और पीछे हटना नामुमकिन हो गया। इसी तनाव ने उन्हें 24 मई की उस मनहूस सुबह तक पहुँचाया, जब उन्होंने बेटी के फ्लैट की बालकनी से छलांग लगा दी।
सुसाइड नोट: उम्मीद जगी, फिर धुंधला गई
साहनी की जेब से मिले सुसाइड नोट में अजय और अनिल गुप्ता का नाम साफ अक्षरों में लिखा था। पुलिस ने शुरुआत में तेजी दिखाई, दोनों को गिरफ्तार किया और जेल भेजा। शहर को लगा कि रसूखदारों पर कानून का शिकंजा कस गया है। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, जांच की धार कुंद पड़ती गई।
सतेंद्र साहनी का केस अब फाइलों में बंद हो चुका है। दक्षिण अफ्रीका से लेकर दून तक चर्चा में रहने वाले गुप्ता बंधु आरोपों से मुक्त हैं। लेकिन रियल एस्टेट की चकाचौंध के पीछे का यह अंधेरा हमेशा याद दिलाएगा कि कभी-कभी करोड़ों के प्रोजेक्ट्स की नींव में सिर्फ ईंट-गारे नहीं, बल्कि किसी की मजबूरी और मौत भी दब जाती है।

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