गैरसैण राजधानी आंदोलन: देहरादून में ऐतिहासिक पदयात्रा, सरकारी तंत्र बेअसर

प्रशासन ने विधानसौधा के पास डिफेंस कॉलोनी का रास्ता बदलने का प्रयास किया, लेकिन पूर्व IAS के नेतृत्व में आंदोलनकारी आगे बढ़े; अब महाकूच की चेतावनी

“नकली विधानसभा के AC कमरों में बैठे नेता, पहाड़ का विकास देखते हैं वोट बैंक की नज़र से” – पार्थ रतूड़ी

देहरादून। उत्तराखंड की स्थायी राजधानी गैरसैण के मुद्दे पर रविवार को ‘स्थाई राजधानी गैरसैण समिति’ ने ऐसा ऐतिहासिक दबाव बनाया कि सरकारी तंत्र के हाथ-पैर फूल गए। अस्थाई विधान सभा देहरादून से निकाली गई पदयात्रा ने मंत्रियों और वीआईपी की डिफेंस कॉलोनी को उस समय चीर दिया, जब प्रशासन ने वहां से मार्च जाने पर रोक लगाने की कोशिश की थी।

भीषण गर्मी और तपती धूप के बीच जनता में ‘अलख’ जगाने के लिए निकाले गए इस मार्च में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब पुलिस और सुरक्षाकर्मियों ने डिफेंस कॉलोनी के रास्ते को अवरुद्ध करते हुए आंदोलनकारियों को रोकने का प्रयास किया। लेकिन आंदोलन के सर्वोच्च नेता एवं पूर्व IAS विनोद प्रसाद रतुड़ी मौके पर ‘चट्टान’ की तरह अड़ गए। उनके संयम और दृढ़ इच्छाशक्ति के सामने सरकारी तंत्र बेअसर साबित हुआ।

गतिरोध बढ़ता देख, अधिकारियों को डिफेंस कॉलोनी के सचिव से फोन पर बात करनी पड़ी और अंतत: आंदोलनकारियों को उसी मार्ग से आगे बढ़ने की अनुमति दी गई। ‘गैरसैण राजधानी’ के गगनभेदी नारों के साथ यह पदयात्रा विधानसभा क्षेत्र में पूरे स्वाभिमान के साथ आगे बढ़ी।

इस दौरान 18 वर्षीय युवा आंदोलनकारी पार्थ रतुड़ी का भाषण सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। उन्होंने कहा, “हमारे पहाड़ों के नसीब में सिर्फ जंगली जानवरों का खौफ, जड़ी-बूटियों का संघर्ष और दैवीय आपदाओं की मार लिख दी गई है। इस पूरे पहाड़ की मलाई और तरक्की को डकारने के लिए यह पूरी सरकार देहरादून के वातानुकूलित कमरों (AC कमरे) में बैठी हुई है।”

पार्थ ने सीधे सवाल किया, “क्या इन राजनेताओं को थोड़ी सी भी आत्मग्लानि या शर्म नहीं होती? जिनकी खुद की विधानसभा तक आज तक स्थायी नहीं हो पाई? तुम लोग AC की ठंडी हवा खा रहे हो और पहाड़ की ओर जब देखते हो तो सिर्फ अपने गंदे और लालची वोट बैंक की नजर से देखते हो, विकास की नजर से नहीं।”

उन्होंने कहा कि राज्य गठन के 26 साल बाद भी युवाओं को अपनी ही राजधानी के लिए सड़कों पर धूप में तपना पड़ रहा है — यही दोनों बड़ी पार्टियों (भाजपा-कांग्रेस) की “विकास की सच्चाई” है।

वहीं सचिन थपलियाल (पूर्व छात्रनेता, डीएवी पीजी कॉलेज) ने देहरादून की विधान सभा पर तीखा हमला बोलते हुए कहा, “यह देहरादून एक नकली, थोपी गई और कलंकित राजधानी है। इस फर्जी विधानसभा ने उत्तराखंड के युवाओं का भविष्य खा लिया है। यहां बैठने वालों को पहाड़ की मिट्टी से कोई लगाव नहीं।”

इस पदयात्रा में वरिष्ठ पूर्व IAS अधिकारी एस.एस. पांगती, ब्रिगेडियर सर्वेश डंगवाल, कैप्टन राकेश ध्यानी, लक्ष्मी प्रसाद रतुड़ी, जगदीश ममगाईं, राजेंद्र प्रसाद कंडवाल, रमेश थपलियाल, प्रकाश थपलियाल, आनंद राम, सुधीर गैरोला, मनमोहन शर्मा, अवधेश शर्मा, सत्य प्रकाश कोठियाल सहित सैकड़ों की संख्या में मातृशक्ति और युवा एकजुट रहे।

दिल्ली से भी इस आंदोलन को जोर मिला। राष्ट्रीय राजधानी से सुनील जडली और अनिल बहुगुणा अपने साथियों के साथ विशेष रूप से इस पदयात्रा में शामिल होने पहुंचे। उन्होंने कहा कि गैरसैण की आवाज अब सिर्फ प्रदेश नहीं, पूरे देश के मानचित्र पर दहक रही है।

समिति ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यह पदयात्रा केवल एक ‘चिंगारी’ थी। बहुत जल्द देहरादून से गैरसैण तक ऐसा ‘दावानल’ (आग का गोला) दहकेगा जिसे बुझाना इस गूंगी-बहरी सरकार के बस की बात नहीं होगी। संगठन ने अगले चरण में ‘महाकूच’ (महापदयात्रा) निकालने की घोषणा की है, जो सीधे गैरसैण तक जाएगी और वहां धरना-प्रदर्शन तीव्र किया जाएगा।

इस आंदोलन ने साफ कर दिया है कि अब गैरसैण का मुद्दा सिर्फ ‘प्रशासनिक फाइलों’ तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह विकास, स्वाभिमान और पहाड़ के अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है।

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