वक्‍ फ बिल के लिए सरकार को  व्यापक सहमति बनाने का प्रयास करना चाहिए

वसी जैदी
केंद्र सरकार ने संकेत दिया है कि वक्फ बोर्ड संशोधन विधेयक संसद के बजट सत्र में पारित करने के लिए पेश किया जाएगा। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने संयुक्त संसदीय समिति द्वारा अनुशंसित बिल को मंजूर कर लिया है। यानी बिल को संसद में पास करने की कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर ली गई हैं।इस वक्फ बिल के मुद्दे पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और हिंदू संगठन एक-दूसरे के खिलाफ आंदोलित हैं। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने आरोप लगाया कि यदि वक्फ बिल संसद में पारित हो गया, तो हुकूमत हमारी मस्जिदें छीन लेगी, दरगाहें तोड़ देगी और कब्रिस्तान पर भी कब्जा कर लेगी। जाहिर है इन आरोपों में कोई दम नहीं है, फिर भी सरकार को इस बिल के लिए और व्यापक सहमति बनाने का प्रयास करना चाहिए।बहरहाल, संसद के भीतर तमाम संशोधन बहुमत या ध्वनि मत के आधार पर ही पारित किए जाते हैं। यदि जेपीसी में भी यही प्रणाली इस्तेमाल की गई है, तो विपक्ष की आपत्तियां चीखा-चिल्ली के अलावा कुछ और नहीं हैं। कार्यपालिका और विधायिका को सदन में किसी भी मुद्दे या कानून में संशोधन करने के संवैधानिक विशेषाधिकार हैं। सदन में मुस्लिम और सपा, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस आदि-के सांसद भी हैं, इसलिए इस बिल पर संसद में व्यापक बहस होनी चाहिए। बहरहाल, वक्फ बिल को धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप बताया जा रहा है, जबकि वक्फ बोर्ड जमीन और अचल सम्पत्तियों के प्रबंधन का संस्थान है। इसका मुस्लिम धार्मिक पुस्तकों में कोई जिक्र नहीं है। यहां तक कि अधिकांश मुस्लिम देशों में वक्फ बोर्ड का अस्तित्व ही नहीं है। हमारे मूल संविधान में भी वक्फ कानून नहीं था। यह संविधान में एक संशोधन के जरिए 1954 में शामिल किया गया। अनेक मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने भी कहा है कि वक्फ बोर्ड को धर्म से जोडऩा ठीक नहीं है। जहां तक इसमें संशोधन का सवाल है तो यह मांग समय समय पर मुस्लिम समाज से ही उठती रही है। दरअसल,केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय को 2023 में 148 शिकायतें मिली थीं, जिनमें अधिकतर मुसलमानों की ही थीं। आज भी 40,951 मामले ट्रिब्यूनल या अदालतों में लंबित हैं, लिहाजा इस बिल को धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं माना जा सकता। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सन लॉ बोर्ड का यह आरोप बिल्कुल सही नहीं है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सन लॉ बोर्ड ने तीन तलाक कानून और नागरिकता संशोधन विधेयक यानी सीएए के समय भी इसी तरह की बातें की थी जो बाद में गलत साबित हुई। दरअसल, देश में 9 लाख एकड़ से अधिक जमीन वक्फ बोर्ड के अधीन है, जो रेलवे और सेना के बाद सर्वाधिक है। करीब 8।7 लाख संपत्तियों की सालाना आमदनी मात्र 200 करोड़ रुपए बताई जाती रही है, जबकि सच्चर कमेटी की रपट के मुताबिक, यह आमदनी 12,000 करोड़ रुपए से अधिक होनी चाहिए। सवाल है कि इसमें भारी घोटाला है अथवा भू-माफिया की एक जमात हकीकत को छिपाए रखना चाहती है ? विडंबना यह है कि 1।26 लाख करोड़ रुपए, 2023-24 के आकलन के मुताबिक, की संपत्तियों वाले वक्फ के मुस्लिम समाज में आज भी करीब 32 प्रतिशत अनपढ़ और 30 प्रतिशत गरीब मुसलमान हैं। वक्फ बोर्ड ऐसे मुसलमानों की मदद क्यों नहीं करते ? जाहिर है मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के आरोप स्वीकारे नहीं जा सकते हैं, लेकिन फिर भी देश के मौजूदा माहौल को देखते हुए केंद्र सरकार ने और अधिक व्यापक चर्चा करनी चाहिए।इसी के साथ मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी भडक़ाऊ बयानबाजी बंद करनी चाहिए।

(आलेख में वैयक्तिक लेखक के निजी विचार हैं)
(मेरोउत्तराखंड.इन इनका समर्थन नहीं करता है)

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