- इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों एवं खेलकूद गतिविधियों का आयोजन हुआ, 160 प्रतिभागियों ने किया प्रतिभाग
- इस अवसर पर वैज्ञानिकों, अधिकारियों, किसानों एवं विभिन्न हितधारकों की सक्रिय भागीदारी रही
देहरादून।मंगलवार को आईसीएआर-भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान (आईआईएसडब्ल्यूसी), देहरादून ने अपने मुख्यालय में 73वाँ स्थापना दिवस बड़े उत्साह एवं गरिमा के साथ मनाया। इस अवसर पर वैज्ञानिकों, अधिकारियों, किसानों एवं विभिन्न हितधारकों की सक्रिय भागीदारी रही।
इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. हरेंद्र सिंह बिष्ट, निदेशक, सीएसआईआर-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (आईआईपी), देहरादून उपस्थित रहे तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में श्रीमती कहकशां नसीम, आईएफएस, अतिरिक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी, सारा (स्प्रिंगशेड एवं नदी पुनर्जीवन एजेंसी), उत्तराखंड सरकार ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई।
अपने उद्बोधन में मुख्य अतिथि ने मृदा एवं जल संरक्षण के क्षेत्र में संस्थान के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि संस्थान ने भूमि क्षरण को कम करने, वर्षा जल के संरक्षण तथा कृषि उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने सतत विकास के लिए संरक्षण तकनीकों को ऊर्जा दक्षता के साथ जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।
विशिष्ट अतिथि ने स्प्रिंगशेड एवं नदी पुनर्जीवन के क्षेत्र में अपने अनुभव साझा करते हुए प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन को सुदृढ़ करने हेतु आईआईएसडब्ल्यूसी एवं राज्य एजेंसियों के बीच सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया।
संस्थान के निदेशक डॉ. एम. मदहु ने अपने संबोधन में मृदा अपरदन नियंत्रण, भूमि क्षरण में कमी तथा वर्षा आधारित एवं अवनत कृषि पारिस्थितिकी तंत्र में उत्पादकता वृद्धि में संस्थान की उपलब्धियों को विस्तार से प्रस्तुत किया। डॉ. चरण सिंह ने कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों का स्वागत किया तथा स्थापना दिवस के महत्व पर प्रकाश डाला।
आईआईएसडब्ल्यूसी, जो कि आईसीएआर के प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन प्रभाग के अंतर्गत एक प्रमुख संस्थान है, की स्थापना वर्ष 1953-54 में हुई थी। देश के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में स्थित क्षेत्रीय केंद्रों के माध्यम से संस्थान स्थान-विशिष्ट तकनीकों का विकास एवं प्रसार कर रहा है।

हाल के वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार जल अपरदन के कारण भूमि क्षरण में उल्लेखनीय कमी आई है, जो 39.87 प्रतिशत (125.99 मिलियन हेक्टेयर) से घटकर 26.31 प्रतिशत (86.04 मिलियन हेक्टेयर) हो गई है। संस्थान द्वारा 100 मिलियन हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में जलग्रहण विकास कार्यक्रमों के माध्यम से उपचार किया गया है।
संस्थान की तकनीकों के परिणामस्वरूप फसल उत्पादकता में 40 से 412 प्रतिशत तक वृद्धि, जल उपयोग दक्षता में 30 से 84 प्रतिशत तक सुधार तथा उर्वरकों में लगभग ₹10,000 से 15,000 करोड़ वार्षिक बचत संभव हुई है। इससे किसानों की आय में वृद्धि तथा जलवायु सहनशीलता को मजबूती मिली है।
विकसित भारत @2047 की परिकल्पना के अनुरूप संस्थान कृषि उत्पादन, संसाधन उपयोग दक्षता, कृषि वानिकी विस्तार तथा तकनीकी पहुंच को बढ़ाने की दिशा में कार्य कर रहा है।
संस्थान द्वारा 100 से अधिक तकनीकों का विकास किया गया है, जिनमें मृदा संरक्षण, कृषि वानिकी, जल संचयन एवं निर्णय सहयोग प्रणाली शामिल हैं। प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से देशभर में हजारों किसानों, अधिकारियों एवं विद्यार्थियों को लाभान्वित किया गया है।
कार्यक्रम के दौरान प्रगतिशील किसानों को सम्मानित किया गया, जिन्होंने संस्थान की तकनीकों को अपनाकर अवनत भूमि को उत्पादक कृषि भूमि में परिवर्तित किया। साथ ही तकनीकी पुस्तिकाओं एवं हिंदी पत्रिका ‘बुरांश’ का विमोचन भी किया गया।
इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों एवं खेलकूद गतिविधियों का भी आयोजन किया गया। कार्यक्रम में लगभग 160 प्रतिभागियों ने भाग लिया। यह आयोजन मृदा एवं जल संरक्षण, जलवायु सहनशीलता तथा सतत कृषि विकास के प्रति संस्थान की प्रतिबद्धता को पुनः स्थापित करता है।
कार्यक्रम का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।

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