बेहतर स्थिति में भारतीय अर्थव्यवस्था

सतीश सिंह
खाद्य वस्तुओं की कीमतों में कमी के कारण उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर आधारित खुदरा मुद्रास्फीति दर जनवरी महीने में कम होकर 4.31 प्रतिशत के स्तर पर आ गई, जो पिछले 5 महीनों में सबसे कम है। यह दिसम्बर महीने में 5.22 प्रतिशत के स्तर पर थी, जबकि जनवरी 2024 में यह 5.1 प्रतिशत के स्तर पर थी। इससे पहले नवम्बर महीने में महंगाई दर 5.48 प्रतिशत के स्तर पर थी।
महंगाई के बास्केट में लगभग 50 प्रतिशत योगदान खाने-पीने की चीजों का होता है। इनकी महंगाई महीने दर महीने आधार पर जनवरी महीने में घटकर 6.02 प्रतिशत के स्तर पर आ गई। दिसम्बर महीने में यह 9.04 प्रतिशत से घटकर यह 8.39 प्रतिशत के स्तर पर आ गई थी, जो जनवरी 2024 में 8.30 प्रतिशत के स्तर पर थी।
वहीं, ग्रामीण महंगाई दिसम्बर महीने में 5.95 प्रतिशत से घटकर 5.76 प्रतिशत और शहरी महंगाई 4.89 प्रतिशत से घटकर 4.58 प्रतिशत के स्तर पर आ गई थी। मौजूदा गिरावट की सबसे बड़ी वजह सब्जियों की कीमतों में भारी कमी का आना है। आंकड़ों के मुताबिक खाद्य और पेय पदाथरे की महंगाई जनवरी महीने में 5.68 प्रतिशत के स्तर पर रही, जबकि दिसम्बर महीने में यह 7.7 प्रतिशत के स्तर पर थी। खास तौर पर सब्जियों की कीमतें 25.6 प्रतिशत से कम होकर 11.35 प्रतिशत के स्तर पर आ गई, जिससे आमजन को भारी राहत मिली है। इसी क्रम में अनाज की महंगाई जनवरी महीने में 6.24 प्रतिशत के स्तर पर रही, जो दिसम्बर महीने में 6.5 प्रतिशत के स्तर पर रही थी। मांस और मछली की महंगाई जनवरी महीने में 5.25 प्रतिशत के स्तर पर आ गई, जो दिसम्बर महीने में 5.3 प्रतिशत के स्तर पर थी।
गौरतलब है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने दिसम्बर महीने में वित्त वर्ष 2024-25 के लिए महंगाई के अनुमान को 4.8 प्रतिशत कर दिया था, जबकि इसके पहले केंद्रीय बैंक ने इसे 4.5 प्रतिशत के स्तर पर रहने का अनुमान जताया था। वहीं, वित्त वर्ष 2025 और वित्त वर्ष 2026 में महंगाई के भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित सहनशीलता सीमा के अंदर रहने के आसार हैं। किसी की क्रय शक्ति को निर्धारित करने में मुद्रास्फीति महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मुद्रास्फीति बढऩे पर वस्तु एवं सेवा दोनों की कीमतों में इजाफा होता है, जिससे व्यक्ति की खरीदारी क्षमता कम हो जाती है और वस्तुओं एवं सेवाओं की मांग कम हो जाती है।
फिर, उनकी बिक्री कम होती है, उनके उत्पादन में कमी आती है, कंपनी को घाटा होता है, कामगारों की छंटनी होती है, रोजगार सृजन में कमी आती है आदि। फलत: आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ जाती हैं एवं विकास की गति बाधित होती है। ऐसे में यह कहना समीचीन होगा कि महंगाई को कम करने से ही विकास की रफ्तार तेज हो सकती है।  राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) ने जीडीपी के वित्त वर्ष 2024-25 के लिए अपने पहले अग्रिम अनुमान में जीडीपी वृद्धि दर के 6.4 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है, जो पिछले 3 वित्त वर्षो से कम है। गत वित्त वर्ष के दौरान जीडीपी वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत रही थी। वहीं, भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान जीडीपी के 6.6 प्रतिशत की दर से आगे बढऩे का अनुमान जताया है।

वैसे,भारत की जीडीपी वृद्धि दर के कम होने के बावजूद दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका से भारतीय अर्थव्यवस्था बेहतर स्थिति में है और आगामी वर्षो में भी इसके मजबूत बने रहने के आसार हैं। वित्त वर्ष 2024 के दौरान अमेरिका में विकास दर के 2.7 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2025 में 2.0 प्रतिशत रहने का अनुमान है। इधर, खनन और विनिर्माण क्षेत्र के कमजोर प्रदर्शन के कारण दिसम्बर 2024 में भारत औद्योगिक उत्पादन (आईआईपी) वृद्धि दर कम होकर 3.2 प्रतिशत के स्तर पर आ गई। साथ ही, सरकार ने नवम्बर 2024 के आईआईपी आंकड़ों 5.2 प्रतिशत से संशोधित करके 5.00 प्रतिशत कर दिया है। खनन व विनिर्माण क्षेत्र की धीमी रफ्तार और विगत दो तिमाहियों में जीडीपी की धीमी गति को देखते हुए, सरकार विकास की गति को बढ़ाना चाहती है। इसलिए, बजट में भी निवेश, बचत और खपत को बढ़ाने पर जोर दिया गया है, क्योंकि इनमें तेजी लाकर ही आर्थिक गतिविधियों में तेजी लाकर विकास को गति दी जा सकती है।
आर्थिक गतिविधियों में तेजी लाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने 7 फरवरी को की गई मौद्रिक समीक्षा में रेपो दर में 0.25 प्रतिशत की कटौती की, जिससे यह 6.50 प्रतिशत से घटकर 6.25 प्रतिशत के स्तर पर आ गया। गौरतलब है कि करीब 5 सालों के बाद रेपो दर में कटौती की गई है। मुख्य तौर पर महंगाई के कारण केंद्रीय बैंक अभी तक रेपो दर में कटौती करने से परहेज कर रहा था। पिछले दो सालों में 14 प्रतिशत से 16 प्रतिशत के बीच की ऋण वृद्धि रहने के बाद समग्र क्रेडिट ग्रोथ बीते कुछ महीनों से धीमी हो रही है और दिसम्बर 2024 में यह घटकर 11.2 प्रतिशत के स्तर पर आ गई है। इसका एक बड़ा कारण उधारी दर का महंगा होना है। दरअसल, बैंकों के पास सस्ती पूंजी नहीं है। इसलिए वे महंगी दर पर ऋण देने के लिए मजबूर हैं और महंगी दर पर ऋण उपलब्ध होने के कारण आमजन और कारोबारी ऋण लेने से बच रहे हैं। इस वजह से, कंपनियों के पास पूंजी की कमी है, जिसके कारण वे पूरी क्षमता के साथ उत्पादन नहीं कर पा रहे हैं।
आरबीआई द्वारा रेपो दर में 0.25 प्रतिशत की कटौती करने से बैंकों को सस्ती दर पर पूंजी मिलेगी और वे सस्ती दर पर ऋण दे सकेंगे और जब सस्ती दर पर उधार मिलेगा तो आमजन और कारोबारी दोनों ऋण लेंगे, जिससे निवेश और बचत दोनों में तेजी आएगी और खपत बढ़ेगी साथ ही साथ आर्थिक गतिविधियों में भी वृद्धि होगी। बजट में सरकार ने साफ तौर पर बता दिया है कि उसका मकसद विकास को गति देना है। दो तिमाहियों में जीडीपी वृद्धि दर के कम होने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है साथ ही साथ भारत का विकास दर विकसित देशों से भी अधिक है। इसलिए विकास दर में और भी इजाफा लाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो दर में कटौती की है। पुनश्च: जनवरी महीने में महंगाई में कमी आने से आगामी मौद्रिक समीक्षाओं में भी रेपो दर में कटौती करने का रास्ता साफ हो गया है, जिससे देश के विकास रफ्तार को बल मिलेगा।

(आलेख में व्यक्त लेखक के निजी विचार हैं)
(मेरोउत्तराखण्ड.इन इनका समर्थन नहीं करता है)

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