हनुमान जी और तुलसी दोनों ही भगवान विष्णु के परम भक्त हैं, फिर भी धार्मिक मान्यताओं में तुलसी दल को हनुमान जी पर चढ़ाना वर्जित माना गया है। इसके पीछे एक रोचक और शिक्षाप्रद पौराणिक कथा है।
वह अनोखी कथा
एक बार की बात है, जब भगवान विष्णु के अवतार भगवान श्रीराम की आज्ञा से हनुमान जी एक पर्वत से संजीवनी बूटी लेकर लौट रहे थे। मार्ग में उन्हें लगा कि उनकी प्यास बहुत अधिक बढ़ गई है। प्यास बुझाने के लिए वे एक स्थान पर उतरे, जहाँ एक सुंदर तालाब था। उस तालाब के किनारे तुलसी का एक पौधा लगा हुआ था।
प्यास से व्याकुल हनुमान जी ने तालाब का जल पिया और प्यास बुझाई। प्यास बुझने के बाद उन्होंने अपने पराक्रम और शक्ति के मद में आकर तालाब के किनारे उगे उस तुलसी के पौधे को अपने बलशाली हाथों से उखाड़ दिया और अपने मुख से उसकी महक का आनंद लेने लगे।
तुलसी देवी (जो भगवान विष्णु की परम भक्त हैं) इससे बहुत क्रोधित हो गईं। उन्होंने हनुमान जी को श्राप दे दिया कि “आज से तुम पर तुलसी दल कभी नहीं चढ़ाया जाएगा। यदि कोई ऐसा करेगा तो उसे उस पूजा का कोई फल प्राप्त नहीं होगा।”

हनुमान जी को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने तुरंत तुलसी देवी से क्षमा मांगी और कहा, “हे देवी! मैंने अहंकारवश आपका अपमान किया, यह मेरी भूल थी। कृपया मुझे क्षमा करें।”
हनुमान जी की नम्रता और क्षमा याचना से तुलसी देवी शांत हुईं। लेकिन श्राप वापस नहीं लिया जा सकता था। इसलिए उन्होंने एक उपाय बताया। तुलसी देवी बोलीं, “यदि तुम्हारी पूजा में तुलसी दल चढ़ाना ही हो, तो पहले उस तुलसी दल को भगवान श्रीकृष्ण (विष्णु के अवतार) को अर्पित किया जाए, फिर उसके बाद वही दल तुम्हें चढ़ाया जाए। इससे मेरा श्राप भी व्यर्थ नहीं जाएगा और भक्तों की भक्ति भी पूर्ण होगी।”
तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि हनुमान जी को सीधे तुलसी दल नहीं चढ़ाया जाता। पहले उसे भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण को अर्पित किया जाता है और फिर उस प्रसाद रूपी तुलसी दल को हनुमान जी को चढ़ाया जाता है।
रामबाण उपाय: हनुमान जी की कृपा पाने का
हनुमान जी और तुलसी दोनों की एक साथ कृपा पाने के लिए एक अत्यंत शुभ और प्रभावी उपाय है:
1. शनिवार या मंगलवार का दिन चुनें।
2. सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर साफ-स्वच्छ वस्त्र पहनें।
3. पहले तुलसी के पौधे की पूजा करें। उसे जल अर्पित करें और एक दीपक जलाएँ।
4. तुलसी माँ से एक पत्ता मन ही मन माँग लें (बिना तोड़े)।
5. अब हनुमान जी के मंदिर जाएँ या घर में ही उनकी मूर्ति/चित्र के सामने बैठ जाएँ।
6. सबसे पहले वह तुलसी दल भगवान श्रीकृष्ण या शालिग्राम की मूर्ति/चित्र पर चढ़ाएँ। यदि आपके पास यह नहीं है, तो बस मन में भगवान विष्णु का ध्यान करके उन्हें अर्पित कर दें।
7. अब उसी तुलसी दल को प्रसाद के रूप में हनुमान जी को चढ़ाएँ।
8. इसके बाद हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ करें।
9. माना जाता है कि ऐसा करने से तुलसी माँ का श्राप भी सक्रिय नहीं होता और हनुमान जी अत्यंत शीघ्र प्रसन्न होकर भक्त की हर मनोकामना पूरी करते हैं। यह उपाय संकटों को दूर करने और शत्रुओं पर विजय दिलाने में रामबाण साबित होता है।

सारांश: यह कथा हमें अहंकार त्यागने, दूसरों का सम्मान करने और भक्ति में नम्रता बनाए रखने की प्रेरणा देती है। साथ ही, यह परंपरा हिंदू धर्म की गहन सोच और एकात्मकता को दर्शाती है, जहाँ हर नियम के पीछे एक गहना अर्थ छिपा है।
ॐ हनुमते नमः
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