‘कानून या तमाशा ?’ अदालती फैसलों ने धामी सरकार के धर्मांतरण कानून की कलई खोली – गरिमा दसौनी

62 में से 5 मामले पहुंचे सुनवाई तक, सभी में आरोपी बरी; कांग्रेस नेता गरिमा दसौनी ने लगाया सांप्रदायिक राजनीति का आरोप

देहरादून। उत्तराखंड में भाजपा सरकार द्वारा लाए गए विवादास्पद धर्मांतरण विरोधी कानून की प्रभावशीलता को लेकर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। कांग्रेस नेता गरिमा मेहरा दसौनी ने आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि कानून लागू होने के बाद दर्ज कुल 62 मामलों में से मात्र 5 पूर्ण सुनवाई तक पहुंच पाए और इन सभी पांचों में न्यायालय ने आरोपियों को बरी कर दिया।

दसौनी ने शुक्रवार को पत्रकारों से कहा, “सरकार ने इस कानून को ऐतिहासिक और सख्त बताकर जनता में भय और विभाजन का माहौल बनाया। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि यह कानून पूरी तरह खोखला और राजनीतिक नाटक था। एक भी मामले में दोषसिद्धि न होना साबित करता है कि न तो कोई गंभीर समस्या थी और न ही सरकार की गंभीरता।”

उन्होंने सरकार से तीन सीधे सवाल किए:

  1. जब एक भी दोष सिद्ध नहीं हुआ, तो इस कानून का वास्तविक उद्देश्य क्या था?
  2. कमजोर मामले बनाने और फर्जी प्रचार की जिम्मेदारी कौन लेगा?
  3. क्या उत्तराखंड को सांप्रदायिक राजनीति की प्रयोगशाला बनाया जा रहा है?

कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि धामी सरकार ने इस कानून का इस्तेमाल समाज को बांटने, एक वर्ग विशेष को निशाना बनाने और चुनावी लाभ लेने के लिए किया। “नतीजा यह हुआ कि न तो कानून का सम्मान बचा और न ही न्याय प्रणाली पर अनावश्यक बोझ कम हुआ,” उन्होंने कहा।

दसौनी ने दावा किया कि उत्तराखंड की जनता अब इस “राजनीतिक तमाशे” को समझ चुकी है। उन्होंने कहा, “यह कानून कानून कम, राजनीतिक भावनाओं को भड़काने का औजार ज्यादा साबित हुआ है।” सरकार की ओर से अभी तक इन आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।

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