नन्ही परी केस: जनाक्रोश के बाद उत्तराखंड सरकार की सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता संभालेंगे पैरवी

पिथौरागढ़/देहरादून। उत्तराखंड के सबसे संवेदनशील और चर्चित ‘नन्ही परी’ गैंगरेप-हत्या मामले में जनता के भारी आक्रोश के बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल कर दी है। शनिवार (27 सितंबर) को दाखिल इस याचिका का प्रारूपण एसपी सिटी हल्द्वानी प्रकाश चंद्र आर्या ने तैयार किया, जबकि पैरवी की जिम्मेदारी भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को सौंपी गई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर उठाया गया यह कदम न केवल पीड़ित बच्ची को न्याय दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है, बल्कि पूरे प्रदेश में व्याप्त रोष को शांत करने का भी प्रयास माना जा रहा है।

यह मामला 11 साल पुराना है, जो 2014 में काठगोदाम (नैनीताल) में घटित हुआ था। मूल रूप से पिथौरागढ़ जिले की रहने वाली मात्र सात वर्षीय मासूम बच्ची, जिसे प्यार से ‘नन्ही परी’ कहा जाता था, अपने परिवार के साथ शादी में गई थी। 25 जुलाई 2014 को वह वँहा से लापता हो गई। अगले दिन उसका शव जंगल में मिला, जिसमें गैंगरेप और क्रूर हत्या के स्पष्ट निशान थे। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने घटना की भयावहता उजागर की—बच्ची के शरीर पर चाकू के घाव, दुष्कर्म के निशान और सिर पर गंभीर चोटें।
प्रारंभिक जांच में स्थानीय युवक मुख्य आरोपी के रूप में गिरफ्तार हुआ। निचली अदालतों ने साक्ष्यों के आधार पर उसे फांसी की सजा सुनाई—पहले सत्र न्यायालय ने 2015 में दोषी ठहराया, फिर हाईकोर्ट ने 2018 में सजा बरकरार रखी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में (सितंबर 2025 की शुरुआत में) अपील पर सुनवाई करते हुए आरोपी को बरी कर दिया, जिसका आधार अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों में कथित कमियां बताई गईं। यह फैसला आते ही पूरे उत्तराखंड में हंगामा मच गया। पिथौरागढ़, देहरादून और नैनीताल समेत कई जिलों में सड़कें जाम हो गईं, महिलाएं और बच्चे सड़कों पर उतर आए। सोशल मीडिया पर #JusticeForNanhiiPari ट्रेंड करने लगा, और विपक्षी दलों ने सरकार पर निशाना साधा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के ठीक चार-पांच दिनों बाद, 18 सितंबर को मुख्यमंत्री धामी ने आपात बैठक बुलाई और पुनर्विचार याचिका दाखिल करने के सख्त निर्देश दिए। पिथौरागढ़ के डीएम विनोद गोस्वामी ने मंगलवार को बताया, “जनता की भावनाओं का सम्मान करते हुए सरकार ने यह कदम उठाया है। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार की मांग की गई है, जिसमें नए साक्ष्यों और जांच की कमियों को उजागर किया गया।” सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की नियुक्ति को सरकार की गंभीरता का प्रतीक माना जा रहा है, क्योंकि वे केंद्र सरकार के प्रमुख कानूनी सलाहकार हैं और संवेदनशील मामलों में अक्सर पैरवी करते हैं।
प्रदेशभर में चले प्रदर्शनों ने सरकार को झकझोर दिया। पिथौरागढ़ में सैकड़ों महिलाओं ने काले बंधन पहनकर धरना दिया, जबकि देहरादून में एनसीआरबी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बच्ची अपराधों पर सख्त कानून की मांग की गई। विपक्ष ने इसे ‘न्यायिक विफलता’ करार दिया, लेकिन सरकार का कहना है कि यह केवल एक बच्ची का मामला नहीं, बल्कि पूरे समाज की सुरक्षा का सवाल है।

सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई याचिका दाखिल होने के बाद तय होगी, संभवतः अक्टूबर के पहले सप्ताह में। यदि याचिका स्वीकार हुई, तो आरोपी की बरी को चुनौती दी जा सकेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि सॉलिसिटर जनरल की पैरवी से मामले को मजबूती मिलेगी, लेकिन अभियोजन पक्ष को मजबूत साक्ष्य पेश करने होंगे। इस बीच, उत्तराखंड सरकार ने राज्य स्तर पर बच्ची सुरक्षा के लिए नई गाइडलाइंस जारी करने की घोषणा की है, जिसमें फास्ट-ट्रैक कोर्ट और जागरूकता अभियान शामिल हैं।
यह घटना एक बार फिर सवाल खड़ी करती है—क्या हमारी न्याय व्यवस्था मासूमों को समय पर न्याय दे पा रही है? नन्ही परी की यादें आज भी पहाड़ों की वादियों में गूंज रही हैं, और जनता की नजरें अब सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं।

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