वीरेन्द्र कुमार पैन्यूली
18 अगस्त, 2023 में जल विद्युत परियोजनाओं द्वारा मनमाने ढंग से पानी छोड़े जाने से जुड़े सुरक्षा मुददों को गंभीरता से लेते हुए एक विशेष बैठक में राज्य के तत्कालीन मुख्य सचिव प्रबोध सक्सेना ने जब अधिकारियों को बांध सुरक्षा अधिनियम, 2019 और केंद्रीय जल आयोग के 2015 के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन कर पानी छोड़ने वाली परियोजनाओं को वैधानिक नोटिस देकर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए थे तो उनका ऐसा करना पूरे देश के संदर्भ में अनुकरणीय माना गया था।
पानी और सामाजिक क्षेत्र में काम करने वालों ने इसे सराहा था।
असामान्य बाढ़ों और आपदाओं से जूझते हिमाचल में परियोजनाओं से छोड़े गए पानी से राज्य में सार्वजनिक और निजी संपत्तियों, सड़कों और खेती के नुकसान-जोखिम बढ़ने की भी आशंका थी। तब पाया गया कि राज्य में अस्सी प्रतिशत से ज्यादा जल विद्युत परियोजनाएं ऐसी हैं जो इन विनियमनों का पालन नहीं कर रही थीं। लगभग दो साल बाद देश में ही जल विद्युत परियोजनाओं से जनहानि के इस पहलू को बरसात में चर्चा में लाना प्रासंगिक होगा।
डैम सेफ्टी बिल में बांध के गलत प्रबंधन या बांध की क्षति या टूट से नीचे के क्षेत्र में जान-माल और पर्यावरणीय तथा सामाजिक हानियों से सुरक्षा संबंधी कार्यकारी सुझाव और निर्देश हैं। हानियां बांध की ऊंचाई, भंडारण क्षमता, पानी का वेग, पानी के विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचने के समय, जनसंख्या आदि पर भी निर्भर करेंगी।
बिना चेतावनी पानी छोड़े जाने की देश के सर्वाधिक दुखद हादसों में से एक हिमाचल में 8 जून, 2014 में हुआ था। मंडी जिले में लारजी बांध से अचानक छोड़े गए पानी से हैदराबाद के एक इंजीनियरिंग कॉलेज के 24 छात्र-छात्राएं ब्यास नदी के बढ़े तेज बहाव में बह गए थे। पूरा देश इस हादसे से हतप्रभ रह गया था। लार जी बांध परियोजना की सुरंग चार किमी. से ज्यादा लंबी है। चरम बिजली उत्पादन की जल आवश्यकता के कारण नदी लगभग सूखी दिखती है।
पानी न के बराबर देख ही छात्र-छात्राएं नदी में फोटू खींच-खिंचवा रहे थे। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने छात्र-छात्राओं की मृत्यु का कारण लार जी बांध का हत्यारा सा व्यवहार माना था। इन्हीं संदभरे में बांध जलाशयों की निगरानी, निरीक्षण, कार्यान्वन और रखरखाव तथा चेतावनी पण्रालियों को सुचारु करने के लिए कुछ निर्देश भी तय हुए थे। इनके सही पालन पर मुख्य सचिव ने 18 अगस्त को भी जोर दिया था।
रन ऑफ रिवर हो या जलाशय आधारित, बिजली परियोजना, सबमें ज्यादा बिजली की मांग होने या अन्य कारण लंबी-लंबी अवधि तक नदियां लगभग जलविहीन हो जाती हैं। लक्षित उत्पादन पाने के लिए रखरखाव के बाद त्वरित पानी छोड़ दिया जाता है। ऐसे में हादसे हो जाते हैं। मवेशी भी हताहत हो जाते हैं।
उत्तराखंड में उत्तरकाशी और ऋषिकेश से सालोंसाल घाटों या सूखे टापुओं में बैठे लोगों में अचानक परियोजनाओं से पानी छोड़े जाने से अफरातफरी या आम जन, छात्र और पर्यटकों के नदी में बहने के समाचार आते रहते हैं। बाहर से आए लोगों के लिए स्थानीय स्थितियां भी अनजानी होती हैं। ऋषिकेश में रिवर राफ्टिंग की दुर्घटनाओं के संदर्भ में कुछ अनुभवी विषेषज्ञ तो यह भी कह चुके हैं कि ऊपर पहाड़ों की बांध परियोजनाओं द्वारा मनमाने ढंग से पानी छोड़े जाने से ही ऐसे जोखिम बढ़े हैं क्योंकि ऐसे में अचानक सामान्य धाराओं और लहरों में भी असामान्य बदलाव हो जाता है।
उत्तरकाशी में स्थानीय बिजली परियोजना या बैराज से छोड़े गए पानी से हादसों और हानियों के बीच 2007 नवम्बर में उत्तरकाशी में स्थानीय जन धरने पर भी बैठे थे। उनकी मांग थी कि मनेरी भाली जलविद्युत परियोजना की आपदा प्रबंधन योजना और पानी छोड़ने की प्रक्रिया सार्वजनिक की जाए। हिमाचल हादसे के बाद ही झारखंड में भी बिना चेतावनी बांध से पानी छोड़े जाने के कारण पांच छात्रों को अथाह जलराशि ने लील लिया था।
मनमानापन पानी छोड़ने का ही नहीं है, पानी न छोड़ने में भी होता है। मई, 2023 में ही हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने मंडी की एक संस्था की जनहित याचिका पर विचार किया था। इसमें कहा गया था कि पंदोह और बरोत बांधों से ब्यास और ऊहल नदियों में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के 9 अगस्त, 2017 के आदेशों के अनुसार बांधों से नदियों में 15-20 प्रतिशत पानी छोड़ा जाना है। पानी न छोड़े जाने से प्रदूषण, पेयजल बीमारी की आशंका, जलचर पर असर की समस्या बढ़ी हैं।
27 मार्च, 2023 से नाममात्र का पानी छोड़ा जा रहा है। बांध वाले गलत आंकड़े दे रहे हैं। इस पर मुख्य सचिव को भी नोटिस जारी किया गया था। जून, 2013 की केदार आपदा में भी विष्णुप्रयाग बांध के सभी गेट समय पर न खोले जाने के कारण आसपास के क्षेत्र में आपदा बढ़ने के आरोप लगे थे। श्रीनगर बांध परियोजना पर भी बिना चेतावनी सारे गेटों को खोलने से श्रीनगर पर 16 जून को तबाही लाने के आरोप लगे थे।
उन्नीस सौ अस्सी के दशक में एक जनहित याचिका के परिप्रेक्ष्य में सुप्रीम कोर्ट ने टिहरी बांध को अपनी आपदा प्रबंधन कार्ययोजना बनाने को कहा था। समय आ गया है कि बाढ़ और भूस्खलनग्रस्त उत्तराखंड में केंद्र और राज्य सरकार टिहरी बांध परियोजना को अपनी आपदा प्रबंधन कार्ययोजना को सामयिक परिप्रेक्ष्य में जनता से साझा करने को कहें। जल विद्युत्त परियोजनाओं पर आक्रोश तब ज्यादा हो जाता है जब वे विद्युत उत्पादन के लिए ज्यादा से ज्यादा पानी जमा करने के दौरान आगे के क्षेत्रों की मौलिक जरूरतों के लिए भी पानी छोड़ने में आनाकानी करती हैं। हिमाचल शासन जैसे रुख की आवश्यकता सारे देश में महसूस की जा रही है।
खासकर उत्तराखंड में। जरूरत यह भी है कि बांध जलाशय, जलविद्युत गृह और बाढ़ चेतावनियां देने वाले तंत्र में अच्छा समन्वय हो वरना होता तो यही है कि चेतावनियों के नाम पर कुछ जगह तो नदी किनारों पर परियोजना से पानी छोड़े जाने और कभी जलस्तर बढ़ने पर सावधानी बरतने के बोर्ड ही दिखते हैं लेकिन ट्रैफिक और वैसी ही अन्य ध्वनियों के कारण शायद चेतावनियां अनसुनी रह जाती हैं।
(लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)
हिमाचल शासन जैसे रुख की आवश्यकता
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