देहरादून ही नहीं, पूरे उत्तराखंड में आज कानून व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है।

ना पुलिस अभिरक्षा में व्यक्ति सुरक्षित है, ना मॉर्निंग वॉक पर निकले बुजुर्ग, ना महिलाएं, ना कॉलेज के छात्र, ना पत्रकार और ना ही देश की सेवा कर चुके सैन्य अधिकारी — आखिर सुरक्षित है कौन?- गरिमा

देहरादून। आज सुबह रिटायर्ड ब्रिगेडियर जोशी की मॉर्निंग वॉक के दौरान हुई हत्या ने यह साफ कर दिया है कि अपराधियों के हौसले किस कदर बुलंद हैं। दो गुटों की आपसी रंजिश में हुई क्रॉस फायरिंग में एक निर्दोष पूर्व सैन्य अधिकारी की जान चली जाती है — यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि सरकार की नाकामी का जीता-जागता प्रमाण है यह कहना है उत्तराखंड कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री गरिमा मेहरा दसौनी का।

गरिमा ने कहा कि देहरादून, जो कभी शांत और सुरक्षित शहर माना जाता था, आज अपराध की राजधानी बनता जा रहा है।
कहीं चापड़ से गला रेतकर हत्याएं हो रही हैं, कहीं जंगलों में बोरों में लाशें मिल रही हैं, पत्रकारों पर हमले हो रहे हैं, पुलिस कस्टडी में मौतें हो रही हैं — क्या यही है सरकार की कानून व्यवस्था?

नानकमत्ता में पुलिस कस्टडी में बुजुर्ग महिला की मौत हो या रायपुर थाने में पीआरडी जवान की संदिग्ध आत्महत्या — हर घटना सरकार की संवेदनहीनता और लापरवाही को उजागर करती है।
और अब जब सरकार की नाकामी सामने आ रही है, तो जिम्मेदारी लेने के बजाय सत्ता पक्ष के लोग ही व्यवस्थाओं में कमी की बात कर रहे हैं।
गरिमा ने कहा कि पिछले 9 साल से प्रदेश में प्रचंड बहुमत और ट्रिपल इंजन की सरकार भाजपा की है,कैबिनेट मंत्री के परिवार के लोग यदि व्यवस्थाओं पर सवाल उठा रहे हैं तो व्यवस्थाएं बदलने की जिम्मेदारी किसके ऊपर थी?

इन व्यवस्थाओं को सुधारने की जिम्मेदारी किसकी थी?
गरिमा ने कहा कि आज उत्तराखंड की जनता डर और असुरक्षा के माहौल में जी रही है और सरकार सिर्फ बयानबाजी में व्यस्त है।

धामी सरकार को जवाब देना होगा —
क्यों प्रदेश में कानून व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है?
क्यों आम नागरिक खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है?
और कब तक निर्दोष लोग इस नाकामी की कीमत अपनी जान देकर चुकाते रहेंगे?

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