सुबह की सुंदरता और शांति में ध्यान करने का महत्व समझाया गया है। एकांत में ध्यान से मन विचारों से मुक्त होता है और सच्चा एकांत प्राप्त होता है। मौन और प्रेम की वास्तविक अनुभूति ध्यान में होती है। ध्यान को क्रिया का रूप न देकर, खुद को पूरी तरह उसमें डुबाना चाहिए ताकि स्थायी आनंद मिले।
ध्यान लगाना और गहरी सांस लेना यानी ब्रीदिंग एक्सरसाइज से मस्तिष्क को शांत करने के साथ-साथ इसके कार्य क्षमता को भी बढ़ाने में मदद मिलती है। मेडिटेशन से दिमाग फोकस करना, सीखने से दिमाग की क्वालिटी बेहतर होती है, जिससे आप सही निर्णय लेने और चीजों को याद रखने में सक्षम बनते हैं।
आज की सुबह उन सुंदर और सुहानी सुबहों में से थी जो अभूतपूर्व होती हैं। सूरज अभी निकल ही रहा था और आप उसे चीड़ और यूकेलिप्टस के पेड़ों के बीच देख सकते थे। वह दूर तक फैले हुए उस जल के ऊपर था, सुनहरे रंग की चमक पैदा करता हुआ ऐसा प्रकाश जो केवल पहाड़ों और समुद्र के बीच होता है। यह एक अत्यंत शांत, स्तब्ध और स्वच्छ सुबह थी, उस अद्भुत प्रकाश से भरी हुई जिसे आप अपनी आंखों से ही नहीं बल्कि अपने हृदय से भी देखते हैं,और जब आप इसे देखते हैं, तो आकाश पृथ्वी के बहुत निकट होता है और आप उसके सौंदर्य में खो जाते हैं। शायद आप जानते हों कि ध्यान केवल एकांत में करना चाहिए, रात्रि की निस्तब्धता में या उषाकाल की नीरवता में। जब आप एकांत में ध्यान करें, तो सचमुच एकांत हो। इस एकांत का आगमन तभी होता है जब मन विचार से मुक्त हो जाता है। जब कोई इच्छा आप पर हावी होती है और उसके पीछे भागते हुए आपका मन अतीत और भविष्य में भटकने लगता है, तो वहां एकांत नहीं होता। केवल वर्तमान की विराटता में ही इस एकाकीपन का आना संभव होता है।मुझे नहीं मालूम कि आपने कभी ध्यान किया है या नहीं, आप कभी एकाकी हुए हैं या नहीं। एकाकी यानी वह अवस्था जिसमें हर वस्तु से, हर व्यक्ति से, हर विचार और वासना से बिल्कुल दूर, आप केवल अपने साथ होते हैं। किसी काल्पनिक दृश्य या स्वप्न जगत की शरण में जाकर नहीं, बल्कि इस सबसे एकदम दूर, ताकि आपके भीतर कुछ भी ऐसा न हो जिसे पहचाना जा सके, जिसे आप विचार और भाव से छू सकें। इन सबसे इतनी दूर कि इस पूर्ण एकांत में मौन ही फूल बन जाता है, मौन ही ज्योति बन जाता है। केवल ऐसे ध्यान में प्रेम का अस्तित्व होता है।इसे प्रकट करने की चिंता मत कीजिए। यह स्वयं अपने को प्रकट करेगा। इसका उपयोग न करें। इसे क्रिया का रूप देने की कोशिश न करें। यह स्वयं क्रिया करेगा। और जब यह क्रिया करता है तो उस क्रिया में कोई पछतावा, कोई अंतर्विरोध नहीं होता। इसलिए एकाकी होकर ध्यान करें। खो जाएं, डूब जाएं। इतना याद रखने की भी कोशिश न करें कि आप कहां थे। अगर आप इसे याद रखने की कोशिश करते हैं, तो यह याद उस चीज की होगी जो मर चुकी है। और अगर आप इसकी स्मृति को पकड़े रहते हैं, तो आप कभी एकाकी नहीं हो पाएंगे। इसलिए आप अनंत एकांत में, प्रेम के सौंदर्य में, निर्दोषता और नूतनता में डूबकर ध्यान करें। तब जो आनंद मिलेगा, वह स्थायी होगा।
(पुस्तक ‘ध्यान’ से साभार)
-जे. कृष्णमूर्ति

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