पेपर लीक या पॉलिटिकल फील्डिंग ?

देहरादून। उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) की परीक्षा पर छिड़ा विवाद अब राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक गूंज रहा है। पेपर लीक की खबर के बाद विपक्षी दल, बेरोज़गार संगठनों और तथाकथित छात्र हितैषी नेताओं ने सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन चर्चाओं और स्वतंत्र सूत्रों के हवाले से एक और नैरेटिव भी सामने आ रहा है, जिस पर गौर करना ज़रूरी है।

कहा जा रहा है कि यह पूरा विवाद केवल एक परीक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि एक पूर्व नियोजित साजिश की कड़ी हो सकता है। सोशल मीडिया पर परीक्षा से पहले ही लगातार ऐसी पोस्ट और ट्वीट डाले गए, जिनमें खराब मौसम का हवाला देते हुए परीक्षा रद्द करने की मांग उठाई गई। इस बीच, खुद को बेरोज़गारों का नेता बताने वाले बॉबी पंवार का नाम सबसे अधिक चर्चा में है।

चर्चा यह है कि पंवार ने खुले मंच से सरकार को चेतावनी दी थी कि यदि परीक्षा रद्द नहीं हुई तो इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। विभाग जब परीक्षा कराने पर अड़ा रहा, तभी अचानक पेपर लीक की कहानी गढ़ी गई। सूत्र बताते हैं कि यह कोई सामान्य इत्तेफाक़ नहीं था कि पेपर की फोटो सबसे पहले बॉबी पंवार के पास ही पहुंची।

विश्लेषकों का कहना है कि यह सवाल वाजिब है कि हर बार पेपर लीक से जुड़ी पहली तस्वीरें या सूचनाएं आखिरकार उन्हीं तक क्यों पहुंचती हैं। क्या यह महज़ संयोग है या इसके पीछे कोई संगठित रणनीति ?

इस विश्लेषण के मुताबिक, असली खेल छात्रों की समस्याओं के बहाने सरकार को कठघरे में खड़ा करना और राजनीतिक लाभ हासिल करना है। यह भी तर्क दिया जा रहा है कि जबसे उत्तराखंड में नकल-विरोधी कानून लागू हुआ और सख्ती से नौकरियां दी गईं, तबसे कुछ तथाकथित नेताओं की “दुकानें” बंद हो गईं। धामी सरकार का दावा है कि पिछले चार सालों में 25 हज़ार युवाओं को बिना नकल के नौकरी दी गई है। ऐसे में, एक परीक्षा में गड़बड़ी को पूरे तंत्र पर थोपना भी संदेह पैदा करता है।

चर्चा का यह दूसरा पक्ष यह कहता है कि मेहनतकश और प्रतिभाशाली युवाओं को यह समझना होगा कि कहीं वे अनजाने में किसी और की राजनीति के मुफ़्त ब्रांड एंबेसडर तो नहीं बन रहे। असली लड़ाई उन युवाओं की है जो दिन-रात मेहनत कर नौकरी पाना चाहते हैं, न कि उन लोगों की, जो हर विवाद से अपनी सियासत चमकाने में जुटे रहते हैं।

फिलहाल यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि यह नैरेटिव पूरी तरह सच है या सिर्फ एक राजनीतिक चाल। लेकिन इतना तय है कि पेपर लीक का विवाद अब केवल परीक्षा की निष्पक्षता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह उत्तराखंड की राजनीति में बड़ा हथियार बन चुका है। सरकार जांच कर रही है, विपक्ष सवाल उठा रहा है और युवाओं में असमंजस है। सच क्या है, यह तो आने वाले समय और जांच की दिशा ही तय करेगी जिसका परिणाम भविष्य के गर्भ में दफन है।

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