आध्यात्मिक संत प्रेमानंद महाराज अपने सरल स्वभाव और गूढ़ उपदेशों के लिए जाने जाते हैं। उनके सत्संगों में लोग जीवन, भक्ति और मोक्ष से जुड़े सवाल पूछते हैं। हाल ही में उनसे एक ऐसा सवाल किया गया, जिसने वहां मौजूद सभी लोगों का ध्यान खींच लिया। सवाल था—“महाराज, मुझे भूतों का राजा बनना है, क्या ये संभव है?” इस अजीब सवाल पर प्रेमानंद महाराज ने जो उत्तर दिया, वह गहरी सीख देने वाला था।
सवाल सुनकर मुस्कुराए महाराज
जब यह प्रश्न प्रेमानंद महाराज के सामने रखा गया, तो वे पहले मुस्कुराए। उन्होंने न तो सवाल को टाला और न ही पूछने वाले को डांटा। बल्कि उन्होंने इसे मानव मन की विचित्र इच्छाओं से जोड़ते हुए बेहद शांत और सहज अंदाज में जवाब देना शुरू किया।
इच्छाओं की जड़ पर किया प्रहार
महाराज ने कहा कि मनुष्य की हर इच्छा सत्ता, पहचान और अलग दिखने की चाह से जन्म लेती है। चाहे कोई राजा बनना चाहे या भूतों का राजा, मूल भावना अहंकार और वासना ही होती है। जब तक इंसान इस जड़ को नहीं समझता, तब तक शांति संभव नहीं है।
भूतों से नहीं, भावों से डरना चाहिए
अपने जवाब में प्रेमानंद महाराज ने कहा कि असली भूत बाहर नहीं, हमारे मन के भीतर होते हैं। क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार यही सबसे बड़े भूत हैं, जो इंसान को परेशान करते हैं। इन पर विजय पाना ही सच्चा राजत्व है।
सच्चा राजा कौन होता है
महाराज ने समझाया कि जो व्यक्ति अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण पा लेता है, वही सच्चा राजा होता है। बाहरी दुनिया पर शासन करने से ज्यादा जरूरी है भीतर के विकारों को जीतना। भक्ति और नाम स्मरण से ही यह संभव हो पाता है।
सवाल में छिपी थी जीवन की सीख
प्रेमानंद महाराज ने यह भी कहा कि कई बार अजीब लगने वाले सवाल भी गहरी सच्चाई की ओर इशारा करते हैं। अगर इंसान अपनी इच्छाओं को पहचान ले और सही दिशा दे, तो वही जीवन का कल्याण कर सकती हैं।
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