धर्म आधारित सियासत का दौर जोरों पर

नवल किशोर कुमार
सियासत चाहे वह भारत की हो या फिर किसी और देश की, वह देश में रहने वालों के सापेक्ष ही होती है। भारत में विविध धर्मो और पंथों के लोग रहते हैं और यह बात किसी से भी छिपी नहीं है कि यहां की सियासत में धर्म का उपयोग होता रहा है।
धर्म आधारित सियासत के कारण ही 1947 में देश का विभाजन हुआ और भारत तथा पाकिस्तान विश्व के नक्शे पर दो राष्ट्र के रूप में उभरे। लेकिन भारतीय संविधान का आधार धर्मनिरपेक्षता है, जिसकी नजर में सभी धर्म व पंथ एक समान हैं।
वस्तुत: यह बात सही भी है, लेकिन वास्तविकता यह है कि इस देश में धर्म के आधार पर राजनीति ब्रिटिशकाल से जारी है। पहले समाज सुधार आंदोलनों के तहत 1875 में आर्य समाज की स्थापना और बाद में 1906 में मुस्लिम लीग का गठन। यह सियासत तब और जोर पकडऩे लगी जब 1925 में महाराष्ट्र के नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई। आजादी के बाद भी धर्म की घुसपैठ लोकतांत्रिक सियासत में बनी रही। हालांकि प्रारंभिक दौर में इसके प्रभाव कम दिखते थे, लेकिन 1980 के दशक के बाद से इसका प्रभाव रोज-ब-रोज बढ़ता जा रहा है। मौजूदा सच्चाई यह है कि आज हिन्दुत्व का एजेंडा सियासत के केंद्र में है। निश्चित तौर पर इसके लिए भाजपा जिम्मेदार है, लेकिन कांग्रेस की भूमिका भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं रही है। आज की पीढ़ी भले ही शाहबानो केस के बारे में नहीं जानती हो, लेकिन सत्य तो यही है कि राजीव गांधी के कार्यकाल के समय से ही कांग्रेस नरम हिन्दुत्व की पक्षधर रही है। हालांकि उसने खुलकर हिन्दुत्व का पक्ष नहीं लिया है। लिहाजा उसकी विरोधी उसके ऊपर तुष्टिकरण का आरोप लगाती रही है।
बीते 27 जनवरी, 2024 को मध्य प्रदेश के महू-जो कि डॉ. भीमराव आंबेडकर का जन्मस्थान है-वहां एक रैली को संबोधित करते हुए कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सहित भाजपा नेताओं के द्वारा प्रयागराज में चल रहे महाकुंभ के मौके पर स्नान करने पर कटाक्ष किया कि स्नान करने से क्या गरीबी दूर हो सकती है? उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा के नेतागण केवल फोटो खिंचवाने के लिए ऐसा करते हैं। हालांकि खरगे ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि उनके बयान से यदि किसी को किसी प्रकार का ठेस पहुंची हो तो वह इसके लिए माफी मांगते हैं, लेकिन सियासत में बयानों का महत्त्व वही होता है जो धनुष से निकले तीर का होता है।
भाजपा के नेताओं ने खरगे के बयान की आलोचना की और उनके बयान को सनातन धर्म के अपमान से जोड़ा। इस मामले में कांग्रेस को भी एक तरह से बैकफुट पर जाना पड़ा। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को मल्लिकार्जुन खरगे के बचाव में आना पड़ा और उन्हें यह कहना पड़ा कि यह सनातन धर्म का अपमान कैसे हो सकता है? सनातन धर्म कहता है कि राजा को हमेशा अपने जन के कल्याण के बारे में सोचना चाहिए।

धर्म के बहाने वे बेरोजगारी को बढ़ावा नहीं दे सकते और कानून-व्यवस्था को बर्बाद नहीं कर सकते। उन्हें धर्म’ पर किताबें पढऩे और फिर दूसरों को सनातन धर्म का उपदेश देने की जरूरत है। सवाल यह है कि जब देश में धर्म आधारित सियासत का दौर जोरों पर है, तब खरगे के बयान का निहितार्थ क्या है? यह सवाल इसलिए भी कि इंडिया गठबंधन, जिसका नेतृत्व कांग्रेस पार्टी कर रही है, के एक घटक दल समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव भी महाकुंभ में स्नान करते व खरगे के शब्दों में फोटो खिंचवाते नजर आए। दरअसल, हिन्दुत्व के मामले में भाजपा कांग्रेस की तुलना में अधिक सफल है और यह मानने से किसी को गुरेज नहीं होना चाहिए कि कांग्रेस यदि भाजपा को हिन्दुत्व के मोर्चे पर घेरेगी तो उसे असफलता ही हाथ लगेगी। पूर्व में कांग्रेस के नेता राहुल गांधी द्वारा अपना जनेऊ दिखाया जाना एक सुस्पष्ट उदाहरण है। इसलिए भी कांग्रेस सामान्य तौर हिन्दुत्व के सवाल पर भाजपा से टकराना नहीं चाहती है। इसके बदले कांग्रेस ने देश में सामाजिक न्याय के मसले को उठाना शुरू किया है। उसके नेता राहुल गांधी गाहे-बेगाहे जातिगत जनगणना और समानुपातिक आरक्षण की बात कह रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वे कांग्रेस की सियासत को एक नई दिशा देना चाहते हैं, लेकिन यह तो कहना ही पड़ेगा कि हिन्दुत्व की राजनीति का विस्तार भाजपा ने इस स्तर तक कर दिया है कि कांग्रेस चाहकर भी इससे किनारा नहीं कर सकती।
बहरहाल, कांग्रेस को अपनी लाइन और लेंथ स्पष्ट रखनी होगी कि वह सामाजिक न्याय के मसले पर अपनी सियासत को आगे बढ़ाएगी या फिर हिन्दुत्व के सवाल पर। एक साथ दोनों मोचरे पर भाजपा के साथ लडऩे में उसे केवल हार का सामना करना पड़ेगा। ताजा प्रकरण से यह बात स्पष्ट भी हो जाती है, लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि कांग्रेस हिन्दुत्व के भाजपा के नैरेटिव का तोड़ कैसे खोज सकेगी, यदि वह स्वयं हिन्दुत्व के सवाल पर भाजपा को चुनौती देगी? वजह यह कि अब भाजपा देश में सबसे मजबूत पार्टी है और कांग्रेस को कई राज्यों में अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। वैसे भी 1980 के दशक में कांग्रेस की तरफ से राजीव गांधी ने जो किया, उसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा है कि आज इस देश के अल्पसंख्यक भी पूरी तरह से उसके ऊपर विश्वास नहीं करते हैं। दूसरी ओर भाजपा ने हिन्दुत्व के एजेंडे के सहारे ही ओबीसी और दलितों में अपनी पैठ को व्यापक कर लिया है।

(आलेख में व्यक्त लेखक के निजी विचार हैं)
(मेरोउत्तराखण्ड.इन इनका समर्थन नहीं करता है)

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