लोहड़ी की लौ में रेवड़ी-मूंगफली: जानिए 2026 की परंपरा और महत्व

उत्तर भारत में मनाया जाने वाला लोहड़ी का पर्व उत्साह, आस्था और लोक का अनोखा संगम है। हर साल जनवरी के मध्य में मनाई जाने वाली लोहड़ी 2026 में भी पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाई जाएगी। इस पर्व में अग्नि के चारों ओर की प्रतिमाएं कर रेवड़ी, मूंगफली, तिल और गुड़ की रक्षा करने की परंपरा बुढ़ापे से चली आ रही है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आख़िरकार नॉर्वे में आग क्यों लगाई गई?

लोहड़ी पर्व का सांस्कृतिक महत्व
लोहड़ी मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा और उत्तर भारत के कई सिद्धांतों में मनाया जाता है। यह पर्व शीत ऋतु के अंत और ऋतु के आरंभ का प्रतीक माना जाता है। किसान अपनी अच्छी फसल की कामना और प्रकृति की प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए अग्नि देव की पूजा करते हैं। यह पर्व सामूहिकता, खुशी और नई शुरुआत का संदेश देता है।

अग्नि में रेवड़ी और मूंगफली की परंपरा
लोहड़ी की अग्नि में आग में जलने वाली रेवड़ी, मूंगफली और तिल-गुड़ का विशेष धार्मिक और उल्लेख महत्वपूर्ण है। रेवड़ी और गुड़ माकन का प्रतीक माने जाते हैं, जो जीवन में सुख, समृद्धि और मधुर माल की कामना को पूरा करते हैं। वहीं मूंगफली और तिल के छिलके में शरीर को ऊर्जा और गर्माहट देने वाले खाद्य पदार्थ होते हैं, इसलिए स्वास्थ्य और शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

अग्नि देव को अर्पण का भाव
लोहड़ी की अग्नि को साक्षात् अग्नि देव का स्वरूप माना जाता है। सिद्धांत यह है कि अग्नि में अग्नि की सामग्री के माध्यम से मनुष्य अपनी प्रार्थनाओं को ईश्वर तक पहुंचाता है। यह प्रक्रिया नकारात्मक ऊर्जा के नाश और सकारात्मकता के संचार का प्रतीक है। आग के आस-पास, सत्ये हुए की जाने वाली प्रार्थना, जीवन के अवशेषों को समाप्त करने का संकेत मिलता है।

लोक कथा और धार्मिक

लौहड़ी से जुड़ी लोक कथाओं में दुल्ला भट्टी का विशेष स्थान है, जिसमें लोक नायक के रूप में पूजा की जाती है। कहा जाता है कि उन्होंने धर्मगुरुओं की मदद की और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। लोहड़ी पर गाए जाने वाले लोक न्याय गीत नीजी की वीरता और सामाजिक भावना को महत्व देते हैं।

समृद्धि और नई शुरुआत का पर्व
लोहड़ी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि नई सफलता, नए संबंध और नए संकल्पों की शुरुआत का प्रतीक है। रेवड़ी और अग्नि का अर्पण कर लोग आने वाले समय में सुख-शांति, अच्छे स्वास्थ्य और आर्थिक समृद्धि की कामना करते हैं। यही वजह है कि लोहड़ी आज भी उतनी ही आस्था और उल्लास के साथ मनाई जाती है।

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