टैरिफ वॉर :  भारत के सामने गंभीर रोजगार संकट की आहट

अशोक शर्मा
अमरीका के ‘जैसे को तैसा टैरिफ’ से भारत की समक्ष जहां निर्यात के क्षेत्र में बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है तो इसमें आत्मनिर्भर होने का अवसर भी निहित है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस टैरिफ वॉर के कारण हमारी जीडीपी 0.7 प्रतिशत का नुकसान हो सकता है। बेशक यह बहुत कम आंकड़ा लगता है, लेकिन नुकसान 2.53 लाख करोड़ रुपए तक का हो सकता है। यह राशि भी बहुत होती है। विशेषज्ञों का ही आकलन हैं कि यदि जीडीपी कम हुई, तो उत्पादन पर सीधा असर पड़ेगा, लिहाजा फैक्ट्रियां तो कर्मचारियों की छंटनी करेंगी अथवा वेतन कम करेंगी। आकलन यहां तक हैं कि 7-8 लाख नौकरियां जा सकती हैं। ऐसा ही प्रभाव तमिलनाडु की कंपनियों पर पड़ सकता है, जहां कंपनियां इलेक्ट्रॉनिक्स का व्यापार करती हैं। भारत के गुजरात से प्रमुख तौर पर 78,000 करोड़ रुपए के रत्न-आभूषण, पत्थरों का कारोबार अमरीका के साथ किया जाता है। टैरिफ बढऩे से वे ज्यादा महंगे उत्पाद हो जाएंगे। एक उदाहरण एप्पल आईफोन का है, जिसकी फैक्टरियां भारत और चीन में हैं। चीन पर 34 प्रतिशत टैरिफ लगाया गया है। पहले से ही चीन पर टैरिफ काफी ज्यादा है। अब नए टैरिफ के बाद भारत-चीन में निर्मित एप्पल फोन अमरीकी बाजार में महंगा हो जाएगा, तो जाहिर है कि महंगा फोन कोई क्यों खरीदेगा ? नए हालात में भारत की मुद्रा ‘रुपया’ और अधिक कमजोर होगा तथा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी कम होगा। केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय भी स्वीकार कर रहा है कि यह टैरिफ हमारे लिए ‘झटका’ नहीं, बल्कि ‘मिक्स बैग’ है।यानी कुछ तो नुकसान के आसार हैं, लेकिन अवसर भी है। राष्ट्रपति ट्रंप ने करीब 60 देशों पर ‘जैसे को तैसा टैरिफ’ थोपा है, नतीजतन दुनिया में हडक़ंप मचा हुआ है । ज्यादातर देश इसे ट्रंप का ‘व्यापारिक पागलपन’ करार दे रहे हैं। विशेषज्ञों का आकलन हैं कि दुनिया में 122 लाख करोड़ रुपए तक का नुकसान हो सकता है। बहरहाल भारत-अमरीका के बीच अनेक वस्तुओं और उपकरणों आदि का आयात-निर्यात होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पिछली अमरीकी यात्रा के दौरान दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय कारोबार को 500 अरब डॉलर (करीब 43 लाख करोड़ रुपए) तक बढ़ाने के समझौते की घोषणा की थी। अच्छी बात यह है कि भारत के फार्मा, तांबा, तेल, सेमीकंडक्टर, गैस, कोयला, एलएनजी, इंसुलिन, विटामिन्स, कीमती धातुएं (सोना, चांदी, प्लेटिनम), प्रिटेंड सामग्री और जिंक आदि 50 प्रमुख उत्पादों को ‘टैरिफ-मुक्त’ रखा गया है।करीब 6 अरब डॉलर के निर्यात वाली मशीनरी, 4 अरब डॉलर के निर्यात वाले मिनरल फ्यूल, 3 अरब डॉलर निर्यात वाले ऑर्गेनिक केमिकल्स और 1 अरब डॉलर के निर्यात वाले इमारती पत्थर आदि पर टैरिफ के कम असर पडऩे की संभावनाएं हैं, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक्स, स्मार्ट फोन, रत्न-आभूषण और कृषि सरीखे क्षेत्रों पर व्यापक असर पड़ेगा। हमारे किसान 50,000 करोड़ रुपए के चावल, फल- सब्जियां, अनाज आदि अमरीका को भेजते हैं। चावल पर फिलहाल 2।7 फीसदी टैरिफ है, जो कुल मिला कर 9-11 फीसदी के बीच बनता है।टैरिफ बढऩे के बावजूद भारत वियतनाम, थाईलैंड, चीन की तुलना में बेहतर रह सकता है। भारत फार्मा, दवाओं आदि के मामले में व्यापक व्यापार कर सकता है।भारत इस क्षेत्र में अमरीका के साथ करीब 76,000 करोड़ रुपए का कारोबार करता है और यह ‘जैसे को तैसा टैरिफ’ से मुक्त रखा गया है। बहरहाल, इस स्थिति में भारत अपने मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को ज्यादा मजबूत कर सकता है। भारत को ‘इंतजार करो’ और फिर ‘निर्णय लो’ की नीति पर काम करना पड़ेगा।खासतौर पर मैन्युफैक्चरिंग उद्योग को चीन के समकक्ष लाने की कोशिश करनी होगी।इसके अलावा निर्यात के संदर्भ में अमेरिकी बाजार का विकल्प भी हमें तलाशना होगा।वैसे केंद्रीय वित्त, उद्योग और वाणिज्य मंत्रालय स्थिति का नजदीक से आकलन कर रहे हैं। सरकार का दावा है कि भारत को इस कथित टैरिफ वॉर से नुकसान नहीं होगा।

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