
देहरादून। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के निरंजनपुर आश्रम सभागार में आज साप्ताहिक सत्संग कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ संगीतज्ञों द्वारा गाए गए भावपूर्ण भजनों की प्रस्तुति देते हुए किया गया।
भजनों की रसपूर्ण व्याख्या करते हुए मंच का संचालन साध्वी विदुषी अनीता भारती जी के द्वारा किया गया। उन्होंने बताया कि संतों का समागम मनुष्य के आवागमन से मुक्ति का वह समागम है जिसके भीतर इन्सान को ईश्वर से मिलने का, उनके दिव्य दर्शन करने का तथा उनकी शाश्वत प्राप्ति का महान मार्ग दर्शाया जाता है। यह वह मार्ग है जिसकी प्राप्ति के उपरान्त मनुष्य अपने मानव जीवन का परम लक्ष्य पूर्ण कर पाता है, ईश्वर में ही समाहित हो पाता है।
जिस प्रकार एक बच्चा मेले में पिता के साथ जाकर अच्छे-अच्छे खिलौने मिठाइयां खरीदने पर खुश होता है लेकिन यदि वह पिता से बिछुड जाए तथा मेले की भीड़ में खो जाए तो फिर उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता और वह रोने लगता है, तब यदि कोई उसे उसके बिछुडे़ हुए पिता से मिला दे तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता। इसी प्रकार जीवात्मा भी संसार के मेले में अपने परमपिता परमेश्वर से बिछुड़ कर अन्य चीजों में उलझ जाता है तभी कोई पूर्ण गुरू उसे उसके खोए हुए पिता के साथ मिलाकर उसके बिछुड़ने के दुख को मिलन की खुशियों में बदल दिया करते हैं।
गुरू की महत्वता पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि बिना ईश्वर के यह संसार निरर्थक हो जाता है। ईश्वर मिल जाए तो वह सार्थक हो जाता है। पूर्ण गुरू के पावन ब्र“मज्ञान में वह सामर्थ्य है जो जीव तथा ईश्वर को एक कर देता है।
कार्यक्रम में साध्वी विदुषी सुभाषा भारती जी ने प्रवचन करते हुए बताया कि गुरू का शिष्य के जीवन में अत्यधिक महत्व है। गुरू ही शिष्य के बेरंग जीवन में रंग भरते हैं। उसका निर्माण किया करते है। उन्होंने शरीर की समस्त इन्द्रियों के वार्तालाप का रोचक वर्णन करते हुए कहा कि अन्य सभी इन्द्रियों से कहीं बढ़कर आत्मा का महत्व है, आत्मा यदि शरीर से निकल जाए तो समस्त इन्द्रियां ही मृत हो जाती है। इस आत्मा को पूर्ण रूप से जान लेने पर ही जीव की मुक्ति सम्भव हो पाती है। पूर्ण गुरू आत्मा को इसके स्वामी परमात्मा के साथ जब जोड़ देते है तभी यह आत्मा पूर्णता को प्राप्त कर पाती है और मनुष्य को आवागमन की पीड़ा से तभी मुक्ति भी प्राप्त हो जाती है।
कार्यक्रम में देहरादून आश्रम की संयोजिका साध्वी विदुषी अरूणिमा भारती जी ने भी अपने उद्बोधन में कहा कि शिष्य के भीतर के सौन्दर्य से ही गुरू रीझते है। उन्होंने अनेक शास्त्रीय उदाहरणों के माध्यम से बताया कि शिष्य को भक्ति मार्ग पर चलते हुए अपना स्वाध्याय भी अवश्य करते रहना चाहिए। विकारों-बुराइयों से मैला हुआ मन अगर कहीं पवित्र-पावन हो पाता है तो वह है परम गुरू के दिव्य दरबार में आकर उनसे प्राप्त पावन ब्र“मज्ञान के द्वारा ही।
गुरू के एकनिष्ठ चिन्तन से शीघ्र ईश्वर की प्राप्ति पर जोर देते हुए साध्वी जी ने कहा कि तभी गुरू के ज्ञान का पूर्ण लाभ प्राप्त किया जा सकता है। साध्वी जी ने संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी के जीवन वृतान्त को सुनाते हुए कहा कि जब संसार से ठोकर लगती है तब जीव परमात्मा की प्राप्ति की ओर बढ़ता है, गुरू ही एकमात्र उपाय हैं जो जीव को ईश्वर की प्राप्ति करा सकते है।
प्रसाद का वितरण कर साप्ताहिक कार्यक्रम को विराम दिया गया।

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