वेद और पुराणों के अनुसार, बाकी युगों की तरह कलियुग में भी दिव्य रूप से ‘सुधर्म सभा’ का गठन होगा, जो भगवान कल्कि के नेतृत्व में धर्म की पुनर्स्थापना करेगा और सत्ययुग की नींव रखेगा। इस सभा का गठन होना इस बात का संकेत होता है कि अब अधर्म के नष्ट होने और सत्य की रक्षा होने का समय आ गया है।
महाभारत (विष्णुपर्व, अध्याय 28) में कहा गया है कि जब-जब अधर्म बढ़ता है, तब-तब भगवान अपने भक्तों के साथ एक दिव्य संगठन का निर्माण करते हैं। उस संगठन को ‘सुधर्म संघ’ या ‘सुधर्म सभा’ कहा गया है। भविष्य मालिका में भी एक ऐसा ही वर्णन है कि जब कलियुग का अंतिम चरण होगा, तब महाप्रभु कल्कि के नेतृत्व में ‘सुधर्म सभा’ का गठन होगा, जिसमें चारों युगों के श्रेष्ठ भक्त शामिल होंगे और यही सभा आगे जाकर सतयुग लाएगी। इसके अलावा, भविष्य पुराण और देवी भागवत के में भी ऐसा कुछ उल्लेख है, जिसके अनुसार – कलियुग के उत्तरार्ध में धर्म का पुनर्जागरण ‘सुधर्म सभा’ के माध्यम से होगा।क्या है सुधर्म सभा?
‘सुधर्म’ का मतलब है सत्य के धर्म में स्थित रहना। ‘सुधर्म सभा’ का अर्थ है सत्य के धर्म की रक्षा और प्रसार के लिए बनी संस्था। इस संगठन से जुड़े लोग कलियुग की अंधकारमय परिस्थितियों में भी सत्य, धर्म और भक्ति के मार्ग पर अडिग रहने वाले होंगे।
महाभारत और भविष्य मालिका जैसे ग्रंथों की भविष्यवाणियों में इसका उल्लेख मिलता है कि जब कलियुग में असत्य, अन्याय और अधर्म अपने चरम पर पहुँचता है, तब ईश्वर या उनके प्रतिनिधि एक सुधर्म सभा का गठन करते हैं, ताकि मानवता को फिर से सत्य, धर्म और संतुलन के मार्ग पर लाया जा सके, ताकि मानवता को जाति, लोभ और मत से ऊपर उठाकर ईश्वर के मार्ग पर ले जा जाया जा सके। यह सभा अधर्म और अन्याय के विरुद्ध सत्य की रक्षा करने का कार्य करेगी; समाज में नैतिकता, सदाचार और आध्यात्मिकता को पुनर्जीवित करेगी। इसके निर्माण के लिए दिव्य गुणों वाले साधु-संत, विद्वान और सच्चे कर्मयोगी एकत्रित होंगे।
कई आध्यात्मिक गुरु और संतों के अनुसार सुधर्म सभा कोई भौतिक संस्था मात्र नहीं, बल्कि यह एक चेतना होगी, जो पृथ्वी पर सतयुग की पुनर्स्थापना का आरंभ करेगी। पर इसका गठन तभी संभव होगा, जब कुछ बेहद दिव्य आत्माएँ एक साथ जागृत होकर पृथ्वी पर धर्म, ज्ञान और प्रेम का कार्य आरंभ करेंगी। कुछ मतों के अनुसार, वर्तमान समय ही कलियुग का अंतिम चरण है और सुधर्म सभा के बीज भी बोए जा चुके हैं। इन मतों के अनुसार, आज विभिन्न स्थानों पर भक्ति, सत्य और सेवा के आंदोलन चलाए जा रहे हैं, लोग अपने-अपने धर्म के मूल स्वरूप की ओर लौटने की कोशिश कर रहे हैं, जो संकेत देता है कि सुधर्म सभा का बीज पड़ चुका है और धीरे-धीरे यह अपने अदृश्य रूप से दृश्य रूप में आ रही है।
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