व्यस्त दुनिया में शांति का अर्थ : सक्रिय विश्राम

आज के समय में हमेशा सक्रिय रहने की एक अजीब-सी मजबूरी है। कुछ नहीं तो लोग सोशल मीडिया पर ही बिजी दिखने की कोशिश में हैं। यह मेसेज दिया जा रहा कि खाली बैठे रहना निठल्लापन है। लेकिन, इस दबाव में आने की जरूरत नहीं। अपने लिए थोड़ा समय बचा लेना गुनाह नहीं है।

कोई हफ्ते में 70 घंटे काम करने के लिए कह रहा है और कोई 90 घंटे। सभी को चिंता है चीन की। चीन जो आगे निकल चुका है और हमारा क्या होगा। लेकिन, अगर उनकी मुलाकात किसी चीनी के बजाय मार्क ट्वेन से हुई होती तो? तब ट्वेन कहते, ‘मैं आलसी पैदा हुआ था और जवान होने के बाद भी उतना ही आलसी रहा, जितना बचपन में था।’ अगर काम जरूरी है, तो खाली बैठे रहना उससे भी ज्यादा जरूरी। यह हमेशा सच नहीं होता कि खाली बैठने से दिमाग में शैतान का घर हो जाए। हो सकता है कि वहां शैतान के बजाय खुशियां रहने आ जाएं।
डच संस्कृति में एक शब्द है निकसेन (Niksen)। इसका अर्थ है ‘कुछ न करना’। बिना किसी खास उद्देश्य के आराम से बैठना, खिड़की के बाहर देखना या खुद को सिर्फ मौजूदा पलों में डूबने देना। निकसेन का मुख्य विचार यह है कि आप खुद को तनावमुक्त करें और दिमाग को थोड़ा खाली समय दें। यह कोई ध्यान या मेडिटेशन जैसी तकनीक नहीं, जहां आपको किसी खास चीज पर फोकस करना पड़ता है। आखिर दिमाग पर इतना भी जोर क्यों दिया जाए? उसे बस छोड़ दीजिए। वह खुद भी चाहता है कि कोई उससे कुछ न कहे। निकसेन को आधुनिक जीवन की भागदौड़ में मानसिक शांति और रचनात्मकता को बढ़ाने का एक बेहतरीन तरीका माना जाता है।

वैसे भी, हम हमेशा व्यस्त रहने के लिए नहीं बने। हमेशा काम करना हमारा मिजाज नहीं, उसके लिए तो मशीनें हैं। हमारा स्वभाव है बोर होना। जब बोर होंगे, तभी आगे कुछ करने के लिए उत्सुकता बढ़ेगी। खाली रहना जरूरी है सपने देखने के लिए। सपने देखेंगे तभी तो उनको पूरा करने के लिए फिर कोई काम करेंगे। साइकोएनालिसिस के जनक सिगमंड फ्रायड का मानना था कि दिन में देखे गए सपनों से अपनी ताकत और अपनी कमजोरी को समझने में मदद मिलती है। इनके जरिये जाना जा सकता है कि हमारा डर, लक्ष्य और उम्मीदें क्या हैं।

खाली बैठने का यह मलतब नहीं कि हम आलसी हो गए और यह मतलब तो बिल्कुल नहीं कि घर में एक-दूसरे का चेहरा निहारा जाए। यह समय मानसिक विकास और आत्म-विश्लेषण का भी हो सकता है। जब हम कुछ नहीं करते, तब खुद के बारे में सोच रहे होते हैं। उसी समय सबसे ज्यादा करीब होते हैं हम अपने। कभी-कभी हमें खुद को समझने के लिए यही ठहराव चाहिए होता है। खुद से सवाल करना और अपने भीतर झांकना, हो सकता है कि यहीं से किसी और बड़े काम का रास्ता निकल जाए।

जब हम रुकते हैं, तो हमारा दिमाग चलता है। उसे आजादी मिलती है नए विचारों की ओर बढ़ने की। क्या हर दिन घंटों बॉस के दिए टास्क में उलझा रहा शख्स कोई रचनात्मक काम कर सकता है? तमाम बड़ी खोज तब हुईं, रचनाएं तब अस्तित्व में आईं, जब उन्हें गढ़ने वाले शांत थे।

डिसक्लेमर :-
इस लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सटीकता या विश्वसनीयता की गांरंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, पंचांग, मान्यताओं या फिर धर्मग्रंथों से संकलित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है। इसके सही और सिद्ध होने की प्रामाणिकता नहीं दे सकते हैं। इसके किसी भी तरह के उपयोग करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।

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