देहरादून। द लिटरेरी टेबल द्वारा आयोजित “लिटरेचर एंड आर्ट्स फेस्टिवल” के दूसरे दिन ने साहित्य, कला, संस्कृति और आधुनिक तकनीक के बीच एक अनोखा सेतु रच दिया। राजपुर रोड के एक होटल में आयोजित इस समारोह के दूसरे दिन 12 अक्टूबर समारोह की शुरुआत पारंपरिक गणेश वंदना और दीप प्रज्ज्वलन से हुई, जो सृजन की पवित्रता को समर्पित थी। पूरे दिन चले सत्रों में सैकड़ों साहित्य प्रेमी, लेखक, कलाकार और विचारक एकत्र हुए, जहां विमर्श की गहराई ने ज्ञान के प्रकाश को और चमकदार बना दिया। यह महोत्सव न केवल शब्दों का उत्सव था, बल्कि विचारों के संवाद का भी ऐसा मंच साबित हुआ, जहां पुरानी परंपराओं और नई संभावनाओं का संगम हुआ।
महोत्सव के पहले दिन की तुलना में दूसरे दिन का फोकस अधिक विविधतापूर्ण रहा। जहां पहले दिन उद्घाटन सत्र में अभिनेत्री मुनमुन सेन और लेखिका अद्वेता काला जैसे दिग्गजों ने भारतीय साहित्य की जड़ों को मजबूत किया था, वहीं दूसरे दिन आधुनिक चुनौतियों और सांस्कृतिक पहचान पर केंद्रित चर्चाओं ने दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर दिया। आयोजकों के अनुसार, इस फेस्टिवल का उद्देश्य देहरादून को साहित्यिक राजधानी के रूप में स्थापित करना है, और दूसरे दिन के सत्रों ने इसे सिद्ध कर दिखाया।
पहला सत्र: एआई की व्यावहारिकता पर गहन विमर्श
दिन का पहला सत्र “बियॉन्ड द हाइप: प्रैक्टिकल एआई फॉर टुडे एंड टुमॉरो” रहा, जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के हाइप से परे उसके वास्तविक उपयोग पर चर्चा हुई। पैनल में डॉ. प्रेम कश्यप (आईआईटी रुड़की के प्रोफेसर), डॉ. संजीव बथला (एआई विशेषज्ञ), मोना वर्मा (डिजिटल स्टार्टअप की संस्थापक) और जुही खन्ना (टेक जर्नलिस्ट) शामिल थे। मॉडरेटर के रूप में डॉ. कश्यप ने सत्र की शुरुआत करते हुए कहा, “एआई कोई जादू नहीं, बल्कि एक उपकरण है जो मानव सृजन को बढ़ावा दे सकता है, लेकिन इसके नैतिक आयामों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।”
चर्चा में डॉ. बथला ने स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई के उपयोग पर प्रकाश डाला, जहां मशीन लर्निंग से कैंसर का शीघ्र निदान संभव हो रहा है। मोना वर्मा ने महिलाओं के लिए एआई आधारित एजुकेशनल ऐप्स का उदाहरण दिया, जो ग्रामीण क्षेत्रों में सशक्तिकरण का माध्यम बन रहे हैं। जुही खन्ना ने चेतावनी दी कि डेटा प्राइवेसी का उल्लंघन एआई की सबसे बड़ी चुनौती है। सत्र के अंत में दर्शकों से सवाल-जवाब में एक युवा छात्रा ने पूछा कि क्या एआई साहित्य को बदल देगा? जवाब में पैनलिस्टों ने सहमति जताई कि एआई सहायक हो सकता है, लेकिन रचनात्मकता का मूल मानव हृदय में ही बसता है। यह सत्र लगभग 90 मिनट चला और इसे खूब सराहा गया।
दूसरा सत्र: मधुलिका लिडल की साहित्यिक दुनिया का अन्वेषण
दूसरा सत्र लेखिका मधुलिका लिडल की नवीनतम कृति “अ टेल ऑफ टू फ्लेवर्स: द बिटरसवीट बैलेंस इन लव फॉर एप्रिकॉट्स” पर केंद्रित रहा। मॉडरेटर रूपा सोनी, जो स्वयं एक प्रसिद्ध साहित्यिक आलोचक हैं, ने लिडल से उनकी रचना प्रक्रिया पर विस्तार से चर्चा की। लिडल ने बताया कि यह उपन्यास खरबूजों (एप्रिकॉट्स) के प्रतीक के माध्यम से प्रेम की कड़वी-मीठी वास्तविकताओं को उकेरता है। “प्रेम हमेशा मीठा नहीं होता; कभी-कभी यह कड़वाहट ही तो है जो हमें मजबूत बनाती है,” लिडल ने कहा।
सत्र में दर्शकों ने लिडल की पिछली रचनाओं जैसे ‘द एंग्लो इंडियन क्रॉनिकल्स’ से तुलना की, और सोनी ने जोर देकर कहा कि लिडल का लेखन भारतीय-ब्रिटिश संस्कृति के संकर को खूबसूरती से दर्शाता है। सत्र के दौरान पुस्तक हस्ताक्षर सत्र भी आयोजित हुआ, जहां दर्जनों पाठकों ने अपनी प्रतियां सजाईं। यह सत्र साहित्य प्रेमियों के लिए विशेष रूप से यादगार रहा, क्योंकि इसमें कविता पाठ और संगीतमय प्रस्तुति भी शामिल थी।
तीसरा सत्र: भारतीय सभ्यता की पुनर्प्राप्ति
दोपहर के पहले सत्र “फ्रॉम इंडिया टू भारत: रिक्लेमिंग सिविलाइजेशनल आइडेंटिटी” में वक्ता दीपक वोहरा ने भारतीय सभ्यता की प्राचीन जड़ों को आधुनिक संदर्भ में पुनः स्थापित करने पर सारगर्भित व्याख्यान दिया। वोहरा, जो एक प्रमुख इतिहासकार हैं, ने कहा, “भारत केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक सभ्यता है जो वेदों से लेकर वर्तमान डिजिटल युग तक फैली हुई है। हमें अपनी पहचान को पश्चिमी लेंस से मुक्त करना होगा।”
उन्होंने सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर आजादी के आंदोलन तक के उदाहरण दिए, और दर्शकों को आह्वान किया कि युवा पीढ़ी को संस्कृति की गहराई समझनी चाहिए। सत्र में एक इंटरैक्टिव सेशन भी था, जहां दर्शक अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी कहानियां साझा कर रहे थे। यह सत्र लगभग एक घंटे का था और इसे खास तौर पर छात्रों ने सराहा।
चौथा सत्र: दबी आवाजों का उद्घाटन
डॉ. अलोका दासगुप्ता नियोगी का सत्र “ब्रेकिंग द हश: अनअर्थिंग द लेगेसीज़ ऑफ इनहेरिटेड साइलेंस” समाज में दबी हुई आवाजों, विशेषकर महिलाओं और अल्पसंख्यकों की, पर केंद्रित रहा। डॉ. नियोगी ने अपनी रिसर्च के आधार पर बताया कि कैसे पारिवारिक और सामाजिक चुप्पी पीढ़ियों को प्रभावित करती है। “चुप्पी विरासत नहीं, बोझ है। इसे तोड़ना ही सच्ची आजादी है,” उन्होंने कहा।
सत्र में एक शक्तिशाली कविता पाठ हुआ, जहां दर्शक भावुक हो उठे। महिलाओं के सशक्तिकरण पर फोकस करते हुए, डॉ. नियोगी ने #MeToo आंदोलन और उत्तराखंड की स्थानीय कहानियों का जिक्र किया। यह सत्र दोपहर का सबसे भावुक पल साबित हुआ।
अंतिम सत्र: देवी के हर रूप में साहित्यिक गोता
दिन का समापन सत्र “द गॉडेस इन एवरी फॉर्म: ए लिटरेरी डीप डाइव” में अल्का पांडे ने भाग लिया। पांडे, जो मिथकों और स्त्रीवाद पर विशेषज्ञ हैं, ने भारतीय साहित्य में देवी के विभिन्न रूपों—दुर्गा से लेकर काली तक—का विश्लेषण किया। “देवी केवल पूजा की वस्तु नहीं, बल्कि शक्ति का प्रतीक है जो हर स्त्री में विद्यमान है,” पांडे ने कहा।
सत्र में पांडे ने ‘द डेवी इन इंडियन आर्ट एंड लिटरेचर’ जैसी रचनाओं से उद्धरण दिए, और दर्शकों को मिथकों को आधुनिक फेमिनिज्म से जोड़ने का निमंत्रण दिया। मॉडरेटर ने सत्र को समृद्ध बनाने के लिए एक ग्रुप डिस्कशन भी आयोजित किया, जिसमें कला प्रदर्शनी के तत्व भी शामिल थे।
महोत्सव के दूसरे दिन के अंत में आयोजकों ने धन्यवाद ज्ञापित किया और तीसरे चरण की घोषणा की। द लिटरेरी टेबल की संस्थापक ने कहा, “यह फेस्टिवल देहरादून को साहित्य का केंद्र बनाने की दिशा में एक कदम है।” आने वाले वर्षों में यह फेस्टिवल और भी विस्तार लेगा, जहां सृजन और विमर्श का यह संगम जारी रहेगा।

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