उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति ने  राज्यपाल से भेंट कर ‘वन यूनिवर्सिटी-वन रिसर्च’ के अंतर्गत किए गए शोध कार्य की पुस्तक भेंट की

देहरादून(आरएनएस)।   राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (से नि) से उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. दिनेश चन्द्र शास्त्री ने भेंट कर ‘वन यूनिवर्सिटी-वन रिसर्च’ के अंतर्गत किए गए शोध कार्य की पुस्तक भेंट की। प्रो. शास्त्री ने बताया कि विश्वविद्यालय द्वारा ‘‘संस्कृति और भारतीय ज्ञान प्रणाली की पुनर्स्थापनाः उत्तराखण्ड राज्य के सन्दर्भ में’’ विषय पर शोध किया गया है। शोध के माध्यम से मुख्य रूप से हमारे तीर्थाटन और पर्यटन के बीच के अंतर को स्पष्ट किया गया है, साथ ही तीर्थों की मर्यादा बनी रहे इसके लिए शास्त्रों में वर्णित आचरण संहिता (कोड ऑफ कंडक्ट) तैयार किया गया है। उन्होंने कहा कि इस अंतर की अज्ञानता के कारण पवित्र तीर्थ स्थलों की शुचिता प्रभावित हो रही है, जिससे पर्यावरणीय, सामाजिक और प्राकृतिक समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। इस पुस्तक में टेक्नोलॉजी का उपयोग करते हुए क्यू आर कोड भी दिया गया है, जिसके माध्यम से यूट्यूब में आचरण संहिता की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
    प्रो. शास्त्री ने कहा कि तीर्थ स्थानों की गरिमा बनाए रखने के लिए तीर्थयात्रियों के लिए आचरण संहिता अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने बताया कि शास्त्रों के अनुसार तीर्थ यात्रा के दौरान श्रद्धा और संयम का विशेष महत्व है। तीर्थयात्री को मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण रखते हुए आराध्य देव का ध्यान करना चाहिए और ऋषियों एवं गुरुजनों की संगत करनी चाहिए। तीर्थ में पैदल यात्रा को परम तप कहा गया है, वहीं स्वाध्याय, तपस्या, संध्या पूजा, हवन आदि को यात्रा का अभिन्न अंग बताया गया है। आहार-विहार में संयम रखना, संतोषी और स्वावलंबी बनना, सत्य बोलना तथा सभी प्राणियों के प्रति मैत्री, अहिंसा एवं आदर का भाव रखना भी यात्रा के दौरान आवश्यक बताया गया है।

   उन्होंने बताया कि शोध में यह भी स्पष्ट किया गया है कि तीर्थ यात्रा के दौरान किन बातों से बचना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार तीर्थ यात्रा के दौरान मांस, मदिरा, नशीली वस्तुओं आदि का सेवन पूर्ण वर्जित होता है। तीर्थ में दान लेना, तीर्थों में छुआ-छूत का विचार रखना, गरिमा के प्रतिकूल वस्त्र पहनना, तीर्थ के जल में कपड़े धोना, तैर कर पार करना आदि कार्य अनुचित माने गए हैं। राज्यपाल ने विश्वविद्यालय द्वारा किए गए इस शोध कार्य की सराहना करते हुए कहा कि यह प्रयास न केवल हमारी प्राचीन ज्ञान प्रणाली और संस्कृति के प्रचार-प्रसार में सहायक होगा, बल्कि तीर्थ स्थलों की गरिमा बनाए रखने और पर्यावरणीय संतुलन को सुदृढ़ करने में भी उपयोगी है। उन्होंने कहा कि तीर्थाटन आचरण संहिता की जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे।

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