शक की गुंजाइशें कम नहीं

चुनाव आयोग ने पूरे देश में मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण शुरू करने के लिए सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को सक्रिय कर दिया है। कुछ विपक्षी दलों व अन्य लोगों ने इस प्रक्रिया को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया था।
हालांकि जुलाई के अंत तक निर्वाचन आयोग द्वारा राष्ट्रव्यापी पुनरीक्षण पर अंतिम फैसला लेने की भी चर्चा है। अधिकांश राज्यों में 2002 से 2004 के दौरान मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण किया गया था।
आयोग की बेवसाइट के अनुसार, राष्ट्रीय राजधानी में उपलब्ध सूची 2008 की है, जबकि उत्तराखंड में आखरी गहन पुनरीक्षण 2006 में होने की सूचना है।
अवैध विदेशी प्रवासियों के नाम मतदाता सूची में शामिल होने के विवाद के बाद बिहार में यह बहस गरम हुई। इसी वर्ष बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं, जबकि असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु व पश्चिम बंगाल में भी अगले वर्ष होंगे।
बूथ स्तर के कर्मचारियों का आरोप है कि घर-घर जाकर की गई जांच में बड़ी संख्या में नेपाल, बांग्लादेश व म्यामांर के अवैध प्रवासियों के नाम मतदाता सूची में मिले। इस सारी कवायद पर संदेह व्यक्त करने वालों के अनुसार चुनाव आयोग द्वारा मांगे जा रहे दस्तावेज लोगों के पास उपलब्ध नहीं हैं।
साठ फीसद से भी कम नागरिकों के पास पक्का मकान है, केवल 14त्न वयस्क दसवीं तक पढ़े हैं। सवाल है, बड़ी संख्या में बिहारी मजदूर रोजगार के सिलसिले में अन्य राज्यों में जा चुके हैं, उनका नाम इस सूची में शामिल करने का जिम्मा कौन लेगा।
हाशिए पर खड़े लोग, दलितों, वंचितों व गरीबी रेखा के नीचे गुजार करने वालों से दस्तावेजों की सूची मांगना गैरवाजिब है। उस पर भी जिनके नाम पहले ही मतदाता सूची में मौजूद हैं और वे तीन-चार बार अपना मत प्रयोग कर चुके हैं। हैरत है कि इतने व्यापक स्तर पर बनाए गए आधार कार्ड पर सरकार और उसका समूचा तंत्र विश्वास क्यों नहीं कर पाता।
सबके लिए एक सामूहिक व्यवस्था क्यों नहीं दी जाती। देश के हर नागरिक के लिए एकमात्र परिचय पत्र की व्यवस्था हो, जिसके मार्फत समूची जनसंख्या का सटीक अंदाजा भी हो और वही नागकिता की पहचान बने। उसी को मतदानपत्र, लाइसेंस, पैन, बैंक अकाउंट आदि से जोड़ा जाए।
आम नागरिक को तनाव देना व सरकारी महकमों के चक्कर काटने के लिए मजबूर करना या हर कुछ दिनों बाद दस्तावेजों की गड्डियां मुहैया कराना कब तक चलता रहेगा। नि:संदेह सरकार की नीयत पर शक की गुंजाइशें कम नहीं हो रहीं।

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