देहरादून/गोपेश्वर। हर 12 वर्षों में आयोजित होने वाली विश्वप्रसिद्ध श्री नंदा देवी राजजात को इस वर्ष स्थगित कर दिया गया है। अगस्त–सितंबर 2026 में प्रस्तावित राजजात अब वर्ष 2027 में आयोजित की जाएगी। राजजात का नया कार्यक्रम आगामी बसंत पंचमी के अवसर पर जारी किया जाएगा।
यह निर्णय कर्णप्रयाग में आयोजित श्री नंदा देवी राजजात समिति की बैठक में लिया गया। बैठक की अध्यक्षता समिति अध्यक्ष डॉ. राकेश कुंवर ने की। समिति ने बताया कि इस वर्ष मलमास होने के कारण यात्रा के सितंबर के अंत तक खिंचने, यात्रा समापन के समय बुग्यालों में बर्फ जमने, पड़ावों पर आवश्यक ढांचागत सुविधाओं के कार्य पूर्ण न होने तथा प्रशासन की ओर से प्राप्त पुनर्विचार पत्र के आधार पर राजजात को एक वर्ष के लिए स्थगित करने का निर्णय लिया गया।
बैठक में समिति सचिव भुवन नौटियाल, कोषाध्यक्ष सुशील रावत, पं. महानंद मैठाणी, जयविक्रम सिंह कुंवर, भुवन हटवाल, विजेंद्र रावत, देवाल के पूर्व प्रमुख डीडी कुनियाल तथा पृथ्वी सिंह रावत सहित अन्य सदस्य उपस्थित रहे।
उल्लेखनीय है कि श्री नंदा देवी राजजात यात्रा न केवल भारत, बल्कि एशिया की सबसे कठिन और सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्राओं में शुमार की जाती है। उत्तराखंड की लोकआस्था में मां नंदा देवी का विशेष स्थान है। उन्हें हिमालय की पुत्री और भगवान शिव की पत्नी पार्वती का स्वरूप माना जाता है। यात्रा की शुरुआत चमोली जिले के नौटी गांव से होती है, जिसे मां नंदा का मायका माना जाता है। यहां से पूरे विधि-विधान, ढोल-दमाऊं की गूंज और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ मां की डोली प्रस्थान करती है।
करीब 260 किलोमीटर लंबी यह ऐतिहासिक यात्रा जंगलों, नदियों, घाटियों और बर्फीले दर्रों से गुजरते हुए रूपकुंड और होमकुंड तक पहुंचती है। राजजात की एक अनोखी और रहस्यमयी परंपरा ‘चैसिंग्या खाडू’ से जुड़ी है—चार सींगों वाली यह विशेष भेड़ हर 12 वर्षों में ही जन्म लेती है। मान्यता है कि यात्रा के दौरान यही खाडू मां नंदा की डोली की अगुवाई करता है और मां इसी के माध्यम से मार्गदर्शन देती हैं।

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