न्यायपालिका में पारदर्शी व्यवस्था

विजय रावत
भारतीय न्यायपालिका की एक गौरवशाली परंपरा रही है।  हमारी न्यायपालिका ने संविधान और मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए कई बार ऐसे ऐतिहासिक फैसले किए हैं जिनकी चर्चा विश्व न्याय जगत में हमेशा होती रही है।  एक तथ्य और उल्लेखनीय है कि हमारे सुप्रीम कोर्ट के प्रत्येक मुख्य न्यायाधीश ने अपने कार्यकाल में कुछ ना कुछ नवाचार जरूर किया है।  इस परंपरा के अपवाद मौजूदा मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना भी नहीं हैं।  उन्होंने न्यायपालिका की पारदर्शिता के लिए सुप्रीम कोर्ट के सभी न्यायाधीशों की संपत्ति को सर्वोच्च न्यायालय के अधिकृत पोर्टल पर डालकर बेहद प्रेरणादाई कदम उठाया है। दरअसल, दिल्ली हाई कोर्ट के तत्कालीन और इलाहाबाद हाई कोर्ट के मौजूदा जज न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के प्रकरण के बाद जब न्यायपालिका में अधिक पारदर्शिता की मांग सार्वजनिक विमर्श में है, सुप्रीम कोर्ट के सभी वर्तमान न्यायाधीशों के द्वारा न्यायालय की वेबसाइट पर विवरण प्रकाशित करके अपनी संपत्ति का सार्वजनिक रूप से खुलासा करने पर सहमति व्यक्त करना सुखद ही है।  निश्चय ही यह एक सार्थक पहल ही कही जाएगी। दरअसल, वर्तमान परिपाटी के अनुसार न्यायाधीशों के लिये निजी संपत्ति का घोषणा पत्र प्रस्तुत करना एक स्वैच्छिक परंपरा है,जिसे अनिवार्य बनाने की मांग की जाती रही है।  निश्चय ही न्याय व्यवस्था के संरक्षक होने के कारण इसके स्वैच्छिक रहने पर तमाम किंतु-परंतु हो सकते हैं। जनता हमेशा से ही पंच-परमेश्वरों की स्वच्छ-धवल छवि की आकांक्षा रखती है। न्यायाधीशों द्वारा संपत्ति के खुलासे का मुद्दा दशकों तक सार्वजनिक विमर्श में उठता रहा है।  ध्यान रहे वर्ष 1997 में, सुप्रीम कोर्ट ने एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसके अनुसार उसके सभी न्यायाधीशों को अपनी संपत्ति और देनदारियों की घोषणा देश की शीर्ष अदालत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष करनी थी।  इसी प्रकार उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को ये विवरण उनके राज्य के मुख्य न्यायाधीशों के समक्ष पेश करने थे।  हालांकि इस प्रस्ताव के साथ एक शर्त भी जुड़ी थी कि ये घोषणाएं स्वैच्छिक और गोपनीय रहेंगी।  इसके बाद वर्ष 2005 के सूचना के अधिकार अधिनियम को भी एक उम्मीद की किरण के रूप में देखा गया।  हालांकि इसमें भी एक प्रावधान के अनुसार सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों को व्यक्तिगत जानकारी सार्वजनिक करने को लेकर छूट दी गई थी।
तर्क दिया गया था कि जब तक व्यापक सार्वजनिक हित में जरूरी न हो, न्यायाधीशों संबंधी व्यक्तिगत सूचनाएं गोपनीय रखी जाएं।  दरअसल,इन प्रावधानों से न्यायाधीशों की संपत्ति की घोषणाओं की मांग करने वाले याचिकाकर्ताओं के लिए एक अवरोध पैदा हुआ।  हालांकि इसके बावजूद पारदर्शिता बढ़ाने की प्रक्रिया लगातार जारी रही।  सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग की अनुमति देते हुए कहा था कि सूर्य का प्रकाश वास्तव में सबसे अच्छा कीटाणुनाशक है। बहरहाल, निर्वाचित प्रतिनिधियों और नौकरशाहों को अपनी संपत्ति का सार्वजनिक खुलासा करना कानूनन अनिवार्य किया जा चुका है।  ऐसे में आम जनमानस में धारणा बनी रहती है कि न्यायपालिका के बाबत भी कोई व्यवस्था होनी चाहिए।  यह प्रश्न न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता और जबावदेही से भी जुड़ा है। यह सुखद है कि अब सीजेआई संजीव खन्ना की पहल के कारण सुप्रीम कोर्ट के सभी न्यायाधीश अपनी व्यक्तिगत संपत्ति का ब्यौरा देने लगे हैं। इस तरह के फैसले का दूरगामी प्रभाव भी होगा।  दरअसल,इस दिशा में किसी भी पारदर्शी व्यवस्था का व्यापक स्वागत किया जाना चाहिए।  ऐसे किसी भी कदम से उस आम आदमी के विश्वास को भी बल मिलेगा जो हर तरह के अन्याय व भ्रष्टाचार से तंग आकर उम्मीद की अंतिम किरण के रूप में न्यायालयों का रुख करता है।  देश का आम आदमी न्यायाधीशों को सत्य व सदाचारिता के प्रतीक के रूप में देखता है।  वो न्याय देने वालों को न्याय की हर कसौटी पर खरा उतरना देखना चाहता है।  यह न्याय की शुचिता की भी अनिवार्य शर्त है। 

(आलेख में वैयक्तिक लेखक के निजी विचार हैं)
(मेरोउत्तराखंड.इन इनका समर्थन नहीं करता है)

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