उत्तराखंड पंचायत चुनाव: भाजपा को बढ़त, कांग्रेस की वापसी, और निर्दलीयों का ‘साइलेंट तूफान’

देहरादून। उत्तराखंड की पंचायती सियासत में इस बार का मुकाबला सिर्फ भाजपा और कांग्रेस के बीच नहीं रहा — असली खेल तो ‘किंग मेकर’ बने निर्दलीयों ने दिखा दिया। गांव-गांव की चौपाल से लेकर जिला मुख्यालय तक की सियासी फिजा में इस बार मतदाताओं ने पारंपरिक समीकरणों को हिला कर रख दिया है।
जब परिणामों की तस्वीर पूरी तरह साफ हुई, तो नतीजे चौंकाने वाले थे। भाजपा ने सीटों के लिहाज से बाजी मारी, लेकिन कांग्रेस ने भी ज़ोरदार वापसी की है। वहीं, निर्दलीय उम्मीदवारों ने इतने बड़े पैमाने पर जीत दर्ज की कि दोनों ही बड़ी पार्टियां उनके आगे ‘राग मेलोडी’ गाने को मजबूर हैं।

कौन कितने पानी में?
भाजपा: 122 सीटें सीधे तौर पर, लेकिन पार्टी का दावा है कि बागियों समेत यह आंकड़ा 216 तक पहुंचता है।

कांग्रेस: 80 घोषित विजेता, लेकिन दावा है कि उनके साथ जुड़े निर्दलीयों समेत यह संख्या 160 से ऊपर जा सकती है।

निर्दलीय: 152 सीटों पर सीधी जीत – यह वो उम्मीदवार हैं जिनके पास पार्टी का झंडा नहीं, लेकिन जनसमर्थन का झोंका ज़रूर है।

निर्दलीयों ने बनाया नया सत्ता समीकरण
यह चुनाव सिर्फ हार-जीत का खेल नहीं रहा, यह जनभावनाओं की नई व्याख्या बनकर सामने आया है। गढ़वाल से कुमाऊं तक, निर्दलीयों ने खुद को ‘मुख्य धारा’ में ला खड़ा किया है।

गढ़वाल क्षेत्र में आंकड़े देखिए:
उत्तरकाशी: 21 निर्दलीय
पौड़ी: 24 निर्दलीय
टिहरी: 18 निर्दलीय
रुद्रप्रयाग: 14 निर्दलीय
देहरादून: 10 निर्दलीय

कुमाऊं की बात करें तो:
अल्मोड़ा: 18 निर्दलीय
नैनीताल: 18 निर्दलीय
पिथौरागढ़: 11 निर्दलीय
बागेश्वर: 4
चंपावत: 3
ऊधमसिंहनगर: 11 निर्दलीय विजेता
यह आंकड़े साफ संकेत हैं कि मतदाताओं ने बड़े दलों पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया।

भाजपा और कांग्रेस की रणनीतिक चालें
दोनों ही प्रमुख दल चुनाव परिणामों के बाद अब ‘गणित’ के बजाय ‘रसायन’ की तलाश में हैं — यानी किस निर्दलीय का रुझान किस ओर है। भाजपा ने जहां बागी उम्मीदवारों को दोबारा अपने खेमे में लाने की कोशिशें तेज कर दी हैं, वहीं कांग्रेस भी उन निर्दलीयों को जोड़ने में लगी है जो उसकी विचारधारा के करीब हैं।
भाजपा प्रवक्ता मनवीर सिंह चौहान ने भरोसा जताया कि “मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सारे बागी नेता घर वापसी करेंगे।”
वहीं कांग्रेस अध्यक्ष करण माहरा ने भाजपा पर “झूठ और लोभ” से जीत हासिल करने का आरोप लगाते हुए कहा कि जनता ने उनके मुद्दों को गंभीरता से लिया।

ज़मीनी सियासत में बड़े चेहरों की हार
मतगणना के नतीजों ने कई दिग्गजों को आईना दिखा दिया। नैनीताल से भाजपा विधायक सरिता आर्या और लैंसडाउन से विधायक दलीप रावत के रिश्तेदार तक चुनाव हार गए। और तो और, भाजपा के कई मंत्री अपने-अपने बूथ तक नहीं बचा सके।

मुख्यमंत्री धामी का जलवा बरकरार
वहीं, बात अगर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के विधानसभा क्षेत्र या प्रभारी जनपद की करें तो वहां पर बीजेपी को बड़ी जीत मिली है. उधम सिंह नगर में बीजेपी ने 12 सीट जीती हैं. अपने गृह क्षेत्र में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगभग सभी सीटों पर जीत दर्ज करवाने में कामयाब रहे हैं।यहां धामी की लोकप्रियता और संगठन की पकड़ दिखाई दी।

उत्तराखंड पंचायत चुनाव इस बार एक नया संदेश दे गए हैं — जनता अब केवल पार्टी के नाम पर वोट नहीं देती, वह उम्मीदों और प्रदर्शन का हिसाब मांगती है। भाजपा को संख्यात्मक बढ़त जरूर मिली है, लेकिन कांग्रेस ने वापसी का रास्ता तैयार कर लिया है। और सबसे अहम, निर्दलीयों ने यह साबित कर दिया है कि अब गांव की गद्दी पर वही बैठेगा, जिसके साथ जनता खड़ी होगी — चाहे उसके पीछे कोई झंडा हो या नहीं।

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