असल में, धर्म वो है जो हम अपने जीवन में करते हैं। धर्म के नियमों का पालन करके, हम एक अच्छा और सम्मानित जीवन जी सकते हैं। दुनिया के सबसे पुराने ग्रंथ, ऋग्वेद में भी, धर्म को दुनिया को चलाने वाले नियमों के रूप में बताया गया है।
धर्म का एक ज़रूरी मतलब है अच्छा व्यवहार करना। जैसे सच बोलना, किसी को चोट न पहुँचाना, दान करना, दया करना, और अपने मन को काबू में रखना। ये सब अच्छे गुण धर्म कहलाते हैं। इनसे हमारी ज़िंदगी में शांति, अनुशासन और पवित्रता आती है। इसलिए, ये इंसानी धर्म का ज़रूरी हिस्सा हैं। हमारे धर्म ग्रंथों में भी अच्छे व्यवहार को सबसे बड़ा धर्म माना गया है।
ऋग्वेद में कहा गया है कि अच्छे काम करना ही भगवान की असली पूजा है। ऐतरेय उपनिषद में बताया गया है कि हमारे शरीर की इंद्रियों में देवताओं का वास है, इसलिए हमें हमेशा अच्छे काम करने चाहिए।
अगर कोई इंसान अच्छा व्यवहार नहीं करता, तो उसका ज्ञान और पूजा-पाठ सब बेकार है। वरिष्ठ धर्मसूत्र में लिखा है कि बुरे व्यवहार वाले इंसान को वेद भी पवित्र नहीं कर सकते। ऐसे इंसान का ज्ञान और पूजा-पाठ सब वैसे ही बेकार है, जैसे किसी अंधे के लिए उसकी सुंदर पत्नी का रूप।
सिर्फ पूजा-पाठ करके कोई धार्मिक नहीं बन जाता। चाहे कोई कितनी भी बार गायत्री मंत्र जपे, अगर उसका मन साफ नहीं है, तो सब दिखावा है। पूजा-पाठ तो धर्म का एक छोटा सा हिस्सा है। असली धर्म तो अच्छा व्यवहार है। लेकिन, समय के साथ लोग धर्म के असली मतलब को भूल गए और सिर्फ पूजा-पाठ को ही धर्म समझने लगे।
इसीलिए स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि अगर समाज से धर्म को हटा दिया जाए, तो वो सिर्फ जानवरों का झुंड बनकर रह जाएगा।
डिसक्लेमर
इस लेख में दी गई जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। सूचना के विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/धार्मिक मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संकलित करके यह सूचना आप तक प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना पहुंचाना है, पाठक या उपयोगकर्ता इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी तरह से उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता या पाठक की ही होगी।

Recent Comments